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गजल-लाश मुहब्बत की उठाता फिरता हूँ

लाश मुहब्बत की उठाता फिरता हूँ
गीत गमों के गुनगुनाता फिरता हूँ

काश के मिल जाये खुशी का पल कोई
हाथ फकीरों को दिखाता फिरता हूँ

नींद हमें आती नहीं दुनिया वालो
साथ सितारों को जगाता फिरता हूँ

हो न अँधेरा आशियाने में उनके
सोच यही खुद को जलाता फिरता हूँ

खूब किया है फैसला किस्मत तूने
जख्म भरे दिल को छुपाता फिरता हूँ

उमेश कटारा
मौलिक एंव अप्रकाशित



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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 11, 2013 at 11:20am

हो न अँधेरा आशियाने में उनके
सोच यही खुद को जलाता फिरता हूँ,,, बहुत बढ़िया

 बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 19, 2013 at 5:35pm

आदरणीय उमेशजी, आपकी यह ग़ज़ल एक दफ़े शुरु होकर चुपचाप असर करती जाती है. बहुत-बहुत बधाइयाँ.

सादर

Comment by रमेश कुमार चौहान on November 18, 2013 at 6:54pm
सुंदर प्रस्तुति बधाई
Comment by राजेश 'मृदु' on November 18, 2013 at 3:41pm

हार्दिक बधाई इस सुंदर प्रस्‍तुति पर, सादर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 18, 2013 at 9:31am

खूब किया है फैसला किस्मत तूने
जख्म भरे दिल को छुपाता फिरता हूँ........वाह! कमाल का शेर,

बेहतरीन गजल पर दिली दाद कुबूल कीजिये आदरणीय उमेश जी

Comment by वेदिका on November 17, 2013 at 11:51pm

हो न अँधेरा आशियाने में उनके
सोच यही खुद को जलाता फिरता हूँ,,, बहुत बढ़िया शेअर हुआ है| 

बहुत खूब गज़ल के लिए दाद कुबुलें आ0 उमेश जी!

Comment by ram shiromani pathak on November 17, 2013 at 11:51pm

सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 17, 2013 at 1:39pm

बहुत ही सुन्दर आदरणीय बहुत ही बढ़िया अशआर हार्दिक बधाई स्वीकारें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 16, 2013 at 11:48pm

बहुत बढ़िया आदरणीय उमेश कटारा जी दाद कुबूल करें

Comment by Saarthi Baidyanath on November 16, 2013 at 8:31pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल ....

नींद हमें आती नहीं दुनिया वालो
साथ सितारों को जगाता फिरता हूँ....बहुत खूब उमेश कटारा साहब :)

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