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ग़ज़ल -निलेश 'नूर'-बात जो तुम से निभाई न गई

२१२२, ११२२, २२/ ११२   

.

बात जो तुम से निभाई न गई,
बस वही हम से भुलाई न गई.
....

वो नई रोज़ बना ले दुनियाँ,  
हम से किस्मत भी बनाई न गई.

....

थी दरो दिल पे छपी इक तस्वीर,
जल गया जिस्म, मिटाई न गई.

....
बस मेरे हक़ में बयाँ देना था, 
उन से आवाज़ उठाई न गई.

....

ख्व़ाब था दिल से मिला लें हम दिल,
आँख से आँख मिलाई न गई.  

....

हम गले मिलते भला किससे, कहो!
हमसे तो ईद मनाई न गई.

....

साँस थी, जान थी बाकी मुझ में,
दिल न था नब्ज़ भी पाई न गई.   

............................................
मौलिक व अप्रकाशित 
निलेश 'नूर'

Views: 752

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 2, 2013 at 2:32pm

शुक्रिया आदरणीय सौरभ सर ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 1, 2013 at 6:51pm

आदरणीय नीलेशजी, आपको इस कमाल ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई. पाठकों के सुझावों पर अमल कर आपने इसके अश’आर को मायनेदारबना लिया है.
शुभ-शुभ

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 24, 2013 at 11:40am

शुक्रिया, मेहरबानी, इनायत ... आप सभी का आभार . आदरणीय राणा प्रताप जी, आप के सुझाए अनुसार बदलाव कर लिया है .... मार्गदर्शन हेतु शुक्रिया    


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 24, 2013 at 10:11am

बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है....ये दो शेर बहुत ही बेहतरीन होते और ग़ज़ल के सबसे अच्छे शेर होते पर मुई ये बिंदी .......

 

थी हया आँख में या थे वो ख़फ़ा, 
उन से पलकें ही उठाई न गई.

ख्व़ाब था दिल से मिला लें हम दिल,
याँ तो नज़रें ही मिलाई न गई.  

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 24, 2013 at 6:41am

वो नई रोज़ बना ले दुनियाँ,  
हम से किस्मत भी बनाई न गई.॥ बहुत खूब दर्द उकेरा है आपने

बधाई

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on November 23, 2013 at 8:21pm

 नूर साहब उम्दा गजल कहने के लिये बहुत बहुत बधार्इ 

Comment by umesh katara on November 23, 2013 at 8:52am

शानदार प्रस्तुति है वाह्ह्ह्ह्ह्ह
हम गले मिलते भला किससे कहो
हमसे तो ईद मनाई न गयी
वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्

Comment by विजय मिश्र on November 22, 2013 at 5:40pm
बहुत खूब !!! शुक्रिया
Comment by Sarita Bhatia on November 22, 2013 at 5:33pm

आदरणीय निलेश जी बहुत खूब गजल कही आपने 

साँस थी, जान थी बाकी मुझ में,
दिल न था नब्ज़ भी पाई न गई.  

वाह क्या बात 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 22, 2013 at 2:49pm

आदरणीय निलेश जी ..बेहतरीन ग़ज़ल हर शेर उम्दा..मेरी तरफ से ढेरों बधाई ..सादर

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