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मैं एकलव्य नहीं (लघुकथा)

परीक्षाएं निकट थीं लेकिन टीचर पिछले कई दिनों से क्लास से गायब थे. पढ़ाई का बहुत हर्जा हो रहा था जिसे देखकर उसे बेहद गुस्सा आता. रह रह कर उसके सामने अपनी विधवा बीमार माँ का चेहरा घूम जाता, जो लोगों के घरों में झाड़ू पोछा कर उसे पढ़ा रही थी. आखिर उस से रहा न गया और वह शिकायत लेकर प्रधानाचार्य के पास जा पहुंचा।

 “उस कक्षा में और भी तो विद्यार्थी है, सिर्फ तुम्हें ही शिकायत क्यों है।”
“क्योंकि मैं एकलव्य नहीं हूँ सर।”

(मौलिक और अप्रकाशित)    

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Comment by vandana on December 9, 2013 at 5:54am

बिलकुल..  शिक्षक की यह अकर्मण्यता बिलकुल सहनीय नहीं होनी चाहिए .... सार्थक प्रहार आदरणीय 

Comment by Vindu Babu on December 8, 2013 at 5:56am
समसामयिक शैक्षिक स्थिति को कम शब्दों में अच्छी तरह प्रस्तुत किया है आपने आदरणीय। सच में शोचनीय स्थितियां हैं।
सद्र्ट
सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 8, 2013 at 3:05am

भाई रविजी, आपकी प्रस्तुत लघुकथा शिक्षा के क्षेत्र में वेतनभोगियों की अकर्मण्यता पर सार्थक प्रहार करती हुई है. शिक्षक की लापरवाह अनुपस्थिति के कारण विद्यार्थियों की ऊहापोह प्रस्तुत करती इस कथा के लिए हार्दिक बधाइयाँ.

आपका प्रयास सतत हो और हमारे बीच आप बने रहें.. . शुभेच्छाएँ

Comment by Shubhranshu Pandey on December 5, 2013 at 1:46pm

आदरणीय रवि प्रभाकर जी, 

एकलव्य को एक सर्वथा नये रुप में प्रस्तुत कर कथा को एक नया रुप् दिया है. बधाई..

सादर.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 5, 2013 at 9:03am

बेहतरीन लघु कथा ..सच है एकलव्य ने उस शख्स के लिए कीमत चुकाई जो गुरु कहलाने लायक नहीं था ..गुरु तो द्रोणाचार्य ही बने रहे उन्होंने कुछ नहीं सीखा ..तो कम से कम शिष्य ही सीख लें ..बेहतरीन बिचार ..सादर 

Comment by Neelam Upadhyaya on December 4, 2013 at 5:51pm

आदरणीय रवि जी, गूढ़ता को उकेरती हुयी बहुत ही सुंदर कथा के लिए बधाई.

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 4, 2013 at 4:22pm

आदरणीय लघुकथा के जरिये बहुत ही गहरी बात कह दी आपने बहुत ही सार्थक लघुकथा आदरणीय बहुत बहुत बधाई

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 4, 2013 at 9:52am

लघु कथा सार्थक है | अब प्रश् है की छत्रों को एकलव्य बनाना होगा या अध्यापको को द्रोनाचार्य | न सब एकलव्य बन सकते है और न सब गुरु ग्रोनाचार्य | केवल व्यवस्था ही सुधारनी होगी | लघु कथा के लिए बधाई 

Comment by वेदिका on December 4, 2013 at 3:33am

एकलव्य बनने से शिष्य तत्व का नाश होता है और गुरुता की स्थापना पर संदेह! इस वचनबद्धता के जाल से निकलने के लिए आवाज उठानी ही होगी! बधाई आ० रवि भाई जी!

बहुत बहुत 

Comment by annapurna bajpai on December 3, 2013 at 11:22pm

आ0 रवि प्रभाकर जी बहुत सुंदर लघु कथा , अपने शीर्षक को पूरा न्याय देती हुई , बहुत बधाई आपको । 

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