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ग़ज़ल - आसमानों को संविधान भी क्या // --सौरभ

मिसरों का वज़न - २१२२  १२१२  ११२/२२

 

रौशनी का भला बखान भी क्या !
दीप का लीजिये बयान भी, क्या.. ?!
 
वो बड़े लोग हैं, ज़रा तो समझ--  
उनके लहज़े में सावधान भी क्या !
 
चाँद बस रौंदता है तारों को
आसमानों को संविधान भी क्या !

 

आपसी गुफ़्तग़ू में आईने
पूछते हैं, 'कटी ज़ुबान भी क्या' ?
 

फिर बदन में जो गुदगुदी सी हुई
भूख भरने लगी उड़ान भी क्या ?
 
पंच-परमेश्वरों की धरती पर
हो गये आज के प्रधान भी क्या !
 
बन्द कमरों की खिड़कियों से न पूछ  
था हवादार ये मकान भी क्या ?
 
क्यों न हम छूट के निभा ही लें
हर दफ़ा ये लहू-लुहान भी क्या ?

**************

--सौरभ

(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 1521

Comment

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Comment by ajay sharma on January 15, 2014 at 11:00pm


सर जी ! वाह वाह क्या बात है ही कर सकता हूँ ,

इक शेर और जोड़ दूँगा

मान लीजे तो हैं सरहदें , जनाब !
परिंदों के लिए आसमान भी क्या


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 25, 2013 at 7:23pm

महिमा श्री.. आपको ग़ज़ल अच्छी लगी तो मुझे भी अच्छा लगा. मिसरों ने ग़ोया आपके तेवर को ओढ़ लिये हैं .. :-)))))
हार्दिक धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 25, 2013 at 7:23pm

आदरणीय तिलकराज भाईसाहब, मंच के उस्ताद से इस तरह प्रशंसा पाना, ओह.. ग़ुरूर ला देगा.  :-)))
आपकी नज़र सदा बनी रहे.
सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 25, 2013 at 7:23pm

ग़ज़ल को पसंद करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद, भाई नीरज ’नीर’ जी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 25, 2013 at 7:22pm

भाई लक्ष्मण धामीजी, आपकी आमद ही उत्साहवर्द्धन कर रही है.
शुभ-शुभ

Comment by MAHIMA SHREE on December 25, 2013 at 7:12pm

रौशनी का भला बखान भी क्या ! 
दीप का लीजिये बयान भी, क्या.. ?!... वाह वाह बहुत खूब.. आदरणीय सौरभ सर .. बधाई स्वीकार करें 
  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on December 22, 2013 at 3:01pm

भाई बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई। 

पैरहन है नया नयी खुश्‍बू 

आपने डाल दी है जान भी क्‍या। 

Comment by Neeraj Neer on December 21, 2013 at 4:45pm

 बहुत खूब ग़ज़ल है .. 
पंच-परमेश्वरों की धरती पर 
हो गये आज के प्रधान भी क्या ! 
  क्या कहने ... लाजवाब 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 20, 2013 at 8:12am

चाँद बस रौंदता है तारों को
आसमानों को संविधान भी क्या !

आदरणीय सौरभ भाई

लाजवाब बात कही है हार्दिक बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2013 at 1:13am

आदरणीया माहेश्वरीजी, सादर धन्यवाद..

कृपया ध्यान दे...

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