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दर्द का सावन ……

.

दर्द का सावन तोड़ के बंधन
नैन गली से बह निकला
मुंह फेर लिया जब अपनों ने
तो बैगानों से कैसा गिला

 
जो बन के मसीहा आया था
वो बुत पत्थर का निकला
मैं जिस को हकीकत समझी थी
वो रातों का सपना निकला

है रिश्ता पुराना कश्ती का
सागर के किनारों से लेकिन
जब दुश्मन लहरें बन जाएँ
तो कश्ती से फिर कैसा गिला


जन्मों जन्मों के वादे थे 
इक दूजे का साथ निभाने के
दो चार कदम चल मुंह फेर लिया
तो राहों से फिर कैसा गिला

 
जिस नजर पर भरोसा था हमको
उस नजर ने जलील-ओ-ख़्वार किया
जिन बाहों में घर सोचा था
वो घर कच्ची मिट्टी का निकला ,

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on December 27, 2013 at 1:01pm

aa.Saurabh Pandey jee rachna aapke snehankit shabdon rachna dhany huee...aapka hr sujhaav mere liye amuly hai....aapkee is aatmeey sneh ka haardik aabyaar


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 26, 2013 at 9:00pm

भाई सुशीअजी, आपकी संवेदनापूरित इस कविता के लिए हार्दिक बधाई. आपने हृदय के दग्ध उद्गारों को शब्दबद्ध करने की कोशिश की है. इसके लिए हार्दिक बधाई.
बाकी, आप इस मंच पर बने रहें, रचनाकर्म से सम्बन्धित तथ्य स्वयं उप्लब्ध होते जायेंगे.
सादर

Comment by Sushil Sarna on December 26, 2013 at 7:15pm

aa.Dr.Prachi Singh jee rachna par aapkee aatmeey prashansa ka haardik aabhaar


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 26, 2013 at 3:42pm

सांसारिकता में कभी साथ कभी विछोह, कभी विश्वास तो कभी धोखे के कारण अन्तःक्रंदन को शब्द देती प्रस्तुति..

शुभकामनाएं 

Comment by Sushil Sarna on December 23, 2013 at 7:40pm

aa.Arun Sharma Anant jee aapke sneh ka haardik aabhaar

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 23, 2013 at 1:07pm

आदरणीय सुशील सर बहुत ही सुन्दर रचना मुझे कहीं कहीं प्रवाह बाधित लगा खैर इस रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Sushil Sarna on December 21, 2013 at 2:52pm

aa.Giriraj Bhandaari jee rachna par aapkee snehil prashansa nka haardik aabhaar...aapke dwara ingit truti ko maine edit kr liya hai...jaldee baazee men ye ho gayee...aapkaa is truti pr dhyanakarshan ke liye hardik aabhaar-kripya sneh bnaaye rakhain


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 20, 2013 at 8:32pm

आदरणीय सुशील भाई , बहुत सुन्दर रचना की है , आपको अनेकों बधाइयाँ !!

जलील-ओ-खार -,  शब्द शायद -   जलील-ओ- ख़्वार - होगा एक बार देख लीजियेगा ॥ सादर ॥

Comment by Sushil Sarna on December 20, 2013 at 7:58pm

aa.Savitamishra jee rachna par aapkee aatmeey pratikriya ka haardik aabhaar

Comment by Sushil Sarna on December 20, 2013 at 7:58pm

aa.Avinash S Bagde jee rachna par aapkee madhur prashansa ka haardik aabhaar

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