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ग़ज़ल - छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या

छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या
इल्म लेगा ये इम्तेहान भी क्या

ख़ुद से कर देगा बदगुमान भी क्या 
कोई ठहरेगा मेह्रबान भी क्या

है मुकद्दर में कुछ उड़ान भी क्या
इस ज़मीं पर है आसमान भी क्या

मेरा लहजा ज़रा सा तल्ख़ जो है

काट ली जायेगी ज़बान भी क्या

धूप से लुट चुके मुसाफ़िर को

लूट लेंगे ये सायबान भी क्या

इस क़दर जीतने की बेचैनी
दाँव पर लग चुकी है जान भी क्या

अब के दावा जो है मुहब्बत का
झूठ ठहरेगा ये बयान भी क्या

मेरी नज़रें तो पर्वतों पर हैं
मुझको ललचायेंगी ढलान भी क्या

- वीनस केसरी
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by भुवन निस्तेज on March 25, 2014 at 11:50pm

मेरा लहजा ज़रा सा तल्ख़ जो है

काट ली जायेगी ज़बान भी क्या

 

वाह! बेहतरीन ..........

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on February 5, 2014 at 9:42am

अब के दावा जो है मुहब्बत का
झूठ ठहरेगा ये बयान भी क्या...............बहुत खूब...................

Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on February 2, 2014 at 6:53pm

अयहयहयहय..क्या बात कही है..गजल इसे कहते हैं...वाह..

Comment by Maheshwari Kaneri on January 31, 2014 at 10:25pm

आदरणीय वीनस जी शानदार ग़ज़ल कही है, बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Saarthi Baidyanath on January 30, 2014 at 11:53am

जिंदाबाद ग़ज़ल ! क्या शानदार ग़ज़ल कही है आदरणीय ...हर शेर , सवाल कर रहा है खुलुसियत के साथ ...माशा-अल्लाह ! मेरे पसंदीदा अशआर ..
छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या 
इल्म लेगा ये इम्तेहान भी क्या ..उम्दा आगाज़ 

है मुकद्दर में कुछ उड़ान भी क्या 
इस ज़मीं पर है आसमान भी क्या

मेरा लहजा ज़रा सा तल्ख़ जो है

काट ली जायेगी ज़बान भी क्या

धूप से लुट चुके मुसाफ़िर को

लूट लेंगे ये सायबान भी क्या ..... मजा आ गया ..धूप सा मजा आ गया सर्दियों में !..वाह साहब वाह 

Comment by Abhinav Arun on January 30, 2014 at 11:44am
मेरी नज़रें तो पर्वतों पर हैं
मुझको ललचायेंगी ढलान भी क्या....लाजवाब आपके मेयार की जिंदाबाद ग़ज़ल आदरणीय ...हौसला देते हैं आपके बेलाग बयान ,,साधुवाद !!

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 30, 2014 at 11:33am

इस क़दर जीतने की बेचैनी
दाँव पर लग चुकी है जान भी क्या.. .  इस शेर को देर तक मथता रहा. ’बचे कुछ दिन’ वालों की याद कर मन वाकई सिहर गया.

आप तकाबुले रदीफ़ क्यों रहने देते हैं जी ?


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 28, 2014 at 8:50pm

है मुकद्दर में कुछ उड़ान भी क्या 
इस ज़मीं पर है आसमान भी क्या----वाह्ह्ह्हह वाह्ह्ह 

मेरी नज़रें तो पर्वतों पर हैं 
मुझको ललचायेंगी ढलान भी क्या ---जबरदस्त ,लाजबाब 

ग़ज़ल पर देर से पंहुची इसका खेद है ,पर मजा आ गया पढ़ के सभी शेर लाजबाब हैं पर ये दो तो बार बार पढने को मन करता है ,दिल बधाई कबूलें वीनस जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on January 27, 2014 at 10:58pm

वाह-वाह क्‍या बात है।

उम्‍दा ग़ज़ल। 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 26, 2014 at 1:27pm

है मुकद्दर में कुछ उड़ान भी क्या 
इस ज़मीं पर है आसमान भी क्या

इस क़दर जीतने की बेचैनी 
दाँव पर लग चुकी है जान भी क्या 

मेरी नज़रें तो पर्वतों पर हैं 
मुझको ललचायेंगी ढलान भी क्या ..आदरणीय वीनस सर ..आपकी इस बेहतरीन ग़ज़ल को पढ़कर हमेशा की तरह ही नयी सोच मिली है उधृत किया शेर मुझे बिशेस रूप से पसंद आये ..आपको हार्दिक बधाई केसाथ 

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