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गज़ल... बागों बुलाती है सुबह (कल्पना रामानी)

रात पर जय प्राप्त कर जब जगमगाती है सुबह।

किस तरह हारा अँधेरा, कह सुनाती है सुबह।

 

त्याग बिस्तर, नित्य तत्पर, एक नव ऊर्जा लिए,

लुत्फ लेने भोर का, बागों बुलाती है सुबह।   

 

कालिमा को काटकर, आह्वान करती सूर्य का,

बाद बढ़कर, कर्म-पथ पर, दिन बिताती है सुबह।

 

बन कभी तितली, कभी चिड़िया, चमन में डोलती,

लॉन हरियल पर विचरती, गुनगुनाती है सुबह।

 

फूल कलियाँ मुग्ध-मन, रहते सजग सत्कार को,

क्यारियों फुलवारियों को, खूब भाती है सुबह।

 

इस मधुर वेला में हम भी, क्यों न उठकर चल पड़ें,

मन उतारें रंग जो, हर दिन दिखाती है सुबह।

मौलिक व अप्रकाशित  

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Comment by कल्पना रामानी on February 1, 2014 at 8:12pm

आदरणीय रमेश कुमार जी, आ॰ बृजेश जी,  आ॰ अन्न पूर्णाजी, आ॰  गिरिराज जी, आ॰  नादिर खान जी, आ॰ बैद्यनाथ जी, आ॰ मोहिनीजी, आ॰ नीरज जी, रचना को स्नेह देने के लिए आप सबका हृदय से आभार।

Comment by बृजेश नीरज on February 1, 2014 at 7:32pm

वाह! बहुत सुन्दर! रचना ने मन के भीतर तक सुबह का एहसास करा दिया! आपको बहुत-बहुत बधाई इस खूबसूरत रचनाकर्म पर!

Comment by annapurna bajpai on February 1, 2014 at 7:00pm

आ0 कल्पना दी बहुत सुंदर गजल के लिए आपको हार्दिक बधाई । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 1, 2014 at 6:10pm

आदरणीय कल्पना जी , सुन्दर हिन्दी ग़ज़ल के लिये आपको बधाइयाँ ॥

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 1, 2014 at 4:31pm

वाह क्या सुबह है, हिन्दी की बेहतरीन गजल

आदरणीया रामानीजी बहुत बहुत बधाई

Comment by Neeraj Neer on February 1, 2014 at 2:06pm

वाह सुबह का कितना सुन्दर रूप स्थापित कर दिया आपने इस ग़ज़ल के माध्यम से .. बहुत सुन्दर ...

Comment by mohinichordia on February 1, 2014 at 11:48am

इस मधुर वेला में हम भी ...बहुत सुंदर वर्णन किया है सुबह का , कल्पना जी आपकी हर रचना खूबसूरत होती है |

Comment by Saarthi Baidyanath on February 1, 2014 at 10:41am

बेहतरीन ग़ज़ल ! हिन्दीमय कर दिया हम सबको आपने ! हार्दिक बधाई स्वीकार करें !..

इस मधुर वेला में हम भी, क्यों न उठकर चल पड़ें,

मन उतारें रंग जो, हर दिन दिखाती है सुबह।........उत्तम !

Comment by नादिर ख़ान on January 31, 2014 at 11:44pm

 सुंदर चित्रण आदरणीया कल्पना रामानी जी बहुत खूब ....

बेहतरीन अशआर ........ 

Comment by कल्पना रामानी on January 31, 2014 at 10:53pm

आदरणीया प्राची जी, कुंती जी, आदरणीय शरदिन्दु जी, प्रशंसात्मक शब्दों के लिए हार्दिक आभार

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