For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

एक दूसरे के प्रति त्याग और समर्पण ही सच्चा प्रेम है

एक स्त्री का जब जन्म होता है तभी से उसके लालन पालन और संस्कारों में स्त्रीयोचित गुण डाले जाने लगते हैं | जैसे-जैसे वो बड़ी होती है उसके अन्दर वो गुण विकसित होने लगते है | प्रेम, धैर्य, समर्पण, त्याग ये सभी भावनाएं वो किसी के लिए संजोने लगती है और यूँ ही मन ही मन किसी अनजाने अनदेखे राज कुमार के सपने देखने लगती है और उसी अनजाने से मन ही मन प्रेम करने लगती है | किशोरा अवस्था का प्रेम यौवन तक परिपक्व हो जाता है, तभी दस्तक होती है दिल पर और घर में राजकुमार के स्वागत की तैयारी होने लगती है | गाजे बाजे के साथ वो सपनों का राजकुमार आता है, उसे ब्याह कर ले जाता है जो वर्षों से उससे प्रेम कर रही थी, उसे ले कर अनेकों सपने बुन रही थी | उसे लगता है कि वो जहाँ जा रही हैं किसी स्वर्ग से कम नही, अनेकों सुख-सुविधाएँ बाँहें पसारे उसके स्वागत को खड़े हैं इसी झूठ को सच मान कर वो एक सुखद भविष्य की कामना करती हुई अपने स्वर्ग में प्रवेश कर जाती है | कुछ दिन के दिखावे के बाद कड़वा सच आखिर सामने आ ही जाता है | सच कब तक छुपा रहता और सच जान कर स्त्री आसमान से जमीन पर आ जाती है उसके सारे सपने चकनाचूर हो जाते हैं फिर भी वो राजकुमार से प्रेम करना नही छोड़ती | आँसुओं को आँचल में समेटती वो अपनी तरफ़ से प्रेम समर्पण और त्याग करती हुई आगे बढ़ती रहती है | पर आखिर कब तक ? शरीर की चोट तो सहन हो जाती है पर हृदय की चोट नही सही जाती | आत्मविश्वास को कोई कुचले सहन होता है पर आत्मसम्मान और चरित्र पर उंगुली उठाना सहन नही होता, वो भी अपने सबसे करीबी और प्रिय से | वर्षों से जो स्त्री अपने प्रिय के लम्बी उम्र के लिए निर्जला व्रत करती है, हर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे मत्था टेकती है, हर समय उसके लिए समर्पित रहती है, उसकी दुनिया सिर्फ और सिर्फ उसी तक होती है | एक लम्बी पारी बिताने के बाद भी उससे वो मन चाहा प्रेम नही मिलता है ना ही सम्मान तो वो बिखर जाती है हद तो तब होती है जब उसके चरित्र पर भी वही उंगुली उठती है जिससे वो खुद चोटिल हो कर भी पट्टी बांधती आई है | तब उसके सब्र का बाँध टूट जाता है और फिर उसका प्रेम नफरत में परिवर्तित होने लगता है, फिर भी उस रिश्ते को जीवन भर ढोती है वो, एक बोझ की तरह |
दूसरी तरफ़ क्या वो पुरुष भी उसे उतना ही प्रेम करता है ? जिसेके लिए एक स्त्री ने सब कुछ छोड़ के अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया | वो उसे जीवन भर भोगता रहा, प्रताड़ित करता रहा, अपमानित करता रहा और अपने प्रेम की दुहाई दे कर उसे हर बार वश में करता रहा | क्या एक चिटकी सिन्दूर उसकी मांग में भर देना और सिर्फ उतने के लिए ही उसके पूरे जीवन, उसकी आत्मा, सोच,उसकी रोम-रोम तक पर आधिकार कर लेना यही प्रेम है उसका ? क्या किसी का प्रेम जबरजस्ती या अधिकार से पाया जा सकता है ? क्या यही सब एक स्त्री एक पुरुष के साथ करे तो वो पुरुष ये रिश्ता निभा पायेगा या बोझ की तरह भी ढो पायेगा इस रिश्ते को ? क्या यही प्रेम है एक पुरुष का स्त्री से ? नही, प्रेम उपजता है हृदय की गहराई से और उसी के साथ अपने प्रिय के लिए त्याग और समर्पण भी उपजता है | सच्चा प्रेमी वही है जो अपने प्रिय की खुशियों के लिए समर्पित रहे ना कि सिर्फ छीनना जाने कुछ देना भी जाने | वही सच्चा प्रेम है जो निःस्वार्थ भाव से एक दूसरे के प्रति किया जाए नही तो प्रेम का धागा एक बार टूट जाए तो लाख कोशिशो के बाद भी दुबारा नही जुड़ता उसमे गाँठ पड़ जाता है और वो गाँठ एक दिन रिश्तों का नासूर बन जाता है, फिर रिश्ते जिए नही जाते ढोए जाते हैं एक बोझ की तरह | शायद इसी लिए रहीम दास जी ने कहा है -

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरेउ चटकाय |
टूटे से फिर ना जुरै, जुरै गाँठ परि जाय ||


मीना पाठक 
मौलिक/अप्रकाशित 

Views: 2061

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Meena Pathak on April 15, 2014 at 2:03pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय बृजेश जी 

Comment by बृजेश नीरज on April 15, 2014 at 12:12am

प्रेम न तो सिर्फ त्याग है, और न ही सिर्फ समर्पण! प्रेम निस्वार्थ होता है, उसमें अपेक्षा नहीं होती. उसकी पहली शर्त है, जो जैसा है, उसे वैसा ही, सारी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ स्वीकार करना.

मांग में सिन्दूर भर देना या लेना प्रेम का प्रतीक तो नहीं. दाम्पत्य जीवन में वास्तविक प्रेम कितना है, यह आंकलन का विषय है. अगर यह गिनती शुरू हो जाए कि मैंने तुम्हारे लिए इतना किया और बदले में तुमने क्या किया, तो वहाँ प्रेम कहाँ. प्रेम तो एक-दूसरे के लिए जीना, विश्वास करना सिखाता है

बहरहाल, इस सुन्दर आलेख के लिए आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Meena Pathak on April 12, 2014 at 5:16pm

आदरणीया प्राची जी आप के हर एक शब्द से मै सहमत हूँ | सच कहा है आप ने "प्रेम होता है विशाल ह्रदय रखते हुए, बिना किसी अपेक्षा के, हर हाल में किसी को जैसा वो है वैसा ही स्वीकार करना... वर्ना सिर्फ अपेक्षाएं, समझौते, सौदागरी आदि रह जाता है".... आप के इस स्नेह के लिए मै हृदय से आभारी हूँ, आगे भी ऐसे ही आप से स्नेह मिलता रहेगा इसी आशा के साथ पुन: बहुत बहुत आभार | सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 11, 2014 at 8:01pm

आदरणीया मीना जी 

बहुत संवेदनशीलता और बारीकी से आपने एक स्त्री के मन को झांका है और दाम्पत्य में उसके प्रतिपल तिरोहित होते जाते जीवन को व्यक्त किया है... प्रायः स्त्री को इन सभी बातों का सामना करना पड़ता है..ये बहुत ही शोचनीय है.. पितृसत्तात्मकता नें स्त्रियों को बहुत कमज़ोर किया है.. उनका आर्थिक रूप से पराश्रित होना उनकी उन्नति व् आत्मसम्मान के मार्ग में सबसे बड़ा बाधक है... 

चिंता का विषय तो ये है कि जो स्त्री अपना सर्वस्व न्योच्छावर कर देती है उसके बलिदान को उसका कर्तव्य ही समझ लिया जाता है.. पर ये सब कुछ पितृसत्तात्मकता के जाल में परवरिश के तरीके से उपजे बिहेवियोरल डिसऑर्डर्स हैं, जिन्हें जेण्डर एक्सपर्ट्स की काउंसलिंग के द्वारा कुछ हद तक संतुलन में लाया जा सका है.

वैसे शुरुवात में आपने जिस कल्पनाओं के राजकुमार की बात की है...विवाह से पूर्व तक कुछ वैसी ही परियों की कल्पना पुरुषों की भी होती है... पर अपने काल्पनिक फ्रेम में हूबहू किसी व्यक्ति का फिट बैठना यकीनन संभव नहीं... यहीं एक दूसरे को, जैसे वो हैं वैसे ही अपनाना होता है.

यहाँ ये समझना भी आवश्यक है कि जितना मनुष्य किसी बुरे पल को याद करता है और पकड़ कर बैठ जाता है (यानी एक बार के दुःख में बार बार आंसू बहाता है )..क्या उतना ही किसी अपनत्व के खुशनुमा पल को कभी पकड़ता है ( और एक ही खुशी पर बार-बार खुश होता रहता है)  

जहाँ कहीं भी अवसर मिले कोइ भी इंसान किसी कमज़ोर को अपने अधीन करने से नहीं चूकता... यहाँ स्त्रियों का कमज़ोर होना ही सबसे बड़ा कारण है अन्यथा जहाँ कहीं भी पुरुष कमज़ोर होते हैं स्र्त्रियों को भी उनके प्रति बहुत ही कठोर रवैया अपनाते हुए देखा गया है.

प्रेम क्या है "दुसरे के प्रति त्याग और समर्पण" शायद नहीं!

त्याग सिर्फ त्याग है, समर्पण सिर्फ समर्पण

प्रेम एक बहुत ही बड़ा भाव है...जिसे किसी भी और भाव के साथ मिलाने पर वो विकृत ही होता है... प्रेम होता है विशाल ह्रदय रखते हुए, बिना किसी अपेक्षा के, हर हाल में किसी को जैसा वो है वैसा ही स्वीकार करना... वर्ना सिर्फ अपेक्षाएं, समझौते, सौदागरी आदि रह जाता है. 

इस विषय पर बहुत संवेदनशीलता से आपने आलेख लिखा..आपको इस सार्थक आलेख के लिए बहुत बहुत बधाई आदरणीया मीना जी 

सादर.

Comment by Meena Pathak on April 11, 2014 at 7:13pm

आदरणीय विजय मिश्रा जी सहमत हूँ आपसे ... बहुत बहुत आभार | सादर 

Comment by Meena Pathak on April 11, 2014 at 7:10pm

सादर आभार आदरणीय गिरिराज जी | आपसे स्नेह और आशीर्वाद की हमेशा अपेक्षा रहती है |

Comment by Meena Pathak on April 11, 2014 at 6:58pm

आदरणीय शिज्जू जी बहुत बहुत आभार लेख को आपने समय दिया | सादर 

Comment by विजय मिश्र on April 11, 2014 at 6:27pm
मेरी दृष्टि में ज्यादातर पुरुष भी भावनाप्रधान होते हैं और समानान्तर या अधिकतर महत्व और सम्मान देना भी जानते हैं ,वे मानवीय मर्यादाओं में दाम्पत्य को लेकर चलते हैं |हाँ , वे ह्रदय से उतने धैर्यवान नहीं होते और न ही उनमें एक आयु तक परिपक्वता का वह स्तर होता है जो स्त्रीयों में संभवतः बचपन से ही होता है |गंभीरता भी इनमें बनिस्पत कम होता है |यह सब मिलकर कभी-कभी दुखान्तक और असह्य होता रहता है और संगिनी के मानस को प्रभावित भी करता है |स्त्री के संजोये सपनों और अपेक्षाओं पर यदा-कदा पुरुष के संघर्षपूर्ण दिनचर्या और स्पष्टीकरण न देने के स्वभाव का भी दुष्प्रभाव हो जाता है |मेरा अनुभव कहता है कि दाम्पत्य के शुरू के पन्द्रह साल तक अगर सामंजस्य न हो तो स्त्री कुंठित होती है किन्तु उसके पश्चातकिसी भी स्थिति में घर घरनी का है और वर्चस्व भी उन्हींका |वैसे मौन-मुखर का तादात्म और एक-दूसरे की भावनाओं के लिए आदर ही सुंदर सहचर्य है |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 11, 2014 at 6:17pm

आदरणीया मीना जी , आपने लेख के माध्यम से बहुत सुन्दर विचार व्यक्त किया है , आपको बधाई !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 11, 2014 at 3:36pm

जो बातें आपने कही है वो सच्चाई है हमें सबसे ज़्यादा निराशा तब होती है जब परिस्थितियाँ अपेक्षानुरूप नहीं होती, भविष्य किसी ने नहीं देखा है शादी या प्रेम ये ऐसी घटनायें हैं जो हमें जिस रूप मे मिले उसी रूप में अपनाना पड़ता है, फिर बदलाव बाद की प्रक्रिया है। ये सच है कि आज भी आम हिन्दुस्तानी समाज पुरूषप्रधान है लेकिन इनके अंदर भी भावनायें होती हैं। किसी के मन में क्या है ये बताना तो मुश्किल है, हौसला हिम्मत सजगता हमे हर परिस्थिति का सामना करने में सक्षम बनाती है।
आदरणीया मीनाजी इस लेख के लिये आपको बहुत बहुत बधाई

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

amita tiwari posted a blog post

गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी…See More
8 hours ago
vijay nikore commented on Sushil Sarna's blog post दोहा दशम. . . . . उम्र
"भाई सुशील जी, सारे दोहे जीवन के यथार्थ में डूबे हुए हैं.. हार्दिक बधाई।"
13 hours ago
vijay nikore posted a blog post

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजतेभावनात्मक अवरोधों के दबाव मेंकभी ऐसा भी तो होता है ...समय समय से रूठ जाता…See More
20 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Apr 8
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Apr 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service