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कैसी शुष्कता है?

जो धूप में

बदन झुलसा रही..

भीतर इतनी आग

विरह की जो

केवल धुआँ

और धुआँ देती है

राख तक नसीब नहीं

जिसे रख दूँ संजो कर

तेरी हथेली पर

जब मिलन की बेला हो

और कहूँ कि....

यह पाया मैंने

तुझ बिन...!

     जितेन्द्र ' गीत '

( मौलिक व् अप्रकाशित )

 

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Comment

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Comment by Sachin Dev on April 21, 2014 at 2:50pm

बहुत ही सुंदर लिखा आदरणीय भाई जीतेंद्र जी, हार्दिक बधाई आपको ! 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 21, 2014 at 12:57pm

आपकी उत्साहवर्धक सराहना हमेशा मेरा मनोबल बढाती है, आपका ह्रदय से आभार आदरणीय शिज्जू जी.

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 21, 2014 at 12:55pm

आपका हार्दिक आभार आदरणीया महेश्वरी जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 21, 2014 at 12:54pm

आपका हार्दिक आभार आदरणीया सविता जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 21, 2014 at 12:53pm

 स्नेहिल मार्गदर्शन हेतु आपका ह्रदय से आभार. आदरणीया राजेश दीदी, स्नेह व् आशीर्वाद बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 21, 2014 at 12:52pm

वाह आदरणीय बेहद सुन्दर कविता हेतु बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 20, 2014 at 8:38pm

वाह आदरणीय जितेन्द्र भाई लाजवाब बहुत बढ़िया लिखा है आपने बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Maheshwari Kaneri on April 20, 2014 at 7:33pm

बहुत ही प्रभावशाली और सुन्दर रचना


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 20, 2014 at 12:07pm

वाह्ह वाह बहुत ही प्रभावशाली अभिव्यक्ति अति सुन्दर ,एक जगह शायद गलती से  रख शब्द छूट गया है --

जिसे रख लूँ संजो कर

दूँ तेरी हथेली पर ---दूँ से पहले शायद रख होगा जो छूट गया है या ---जिसे रख दूँ संजोकर  ,तेरी हथेली पर  कर लीजिये ,धुआँ भी ठीक कर लीजिये.बहुत बहुत, बहुत, बधाई इस सुन्दर कविता पर  

Comment by savitamishra on April 20, 2014 at 12:05pm

bahut sundar

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