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ये न फिर कहना पड़े उम्मीद ही बाकी नहीं- ग़ज़ल

2122/ 2122/ 2122/ 212

उँगलियों पर हो निशाँ आँखों में पर पट्टी नहीं

मुल्क की जम्हूरियत बस इंतिखाबी ही नहीं

 

है यही मौका कि बदलें देश की तक़दीर हम

ये न फिर कहना पड़े उम्मीद ही बाकी नहीं

 

हाल क्या होगा हमारा गर्म होगी जब धरा

होगा आँखों में समंदर पर कहीं पानी नहीं

 

गिर पड़ा वो आखरी पत्ता शजर से टूट के

अब रही कोई बहारों की निशानी भी नहीं

 

सूख जायेगा चमन होगी हवा में आग सी

फूल होगा याद में बस, खुश्बुएँ होंगी नहीं

 

इक भयानक ख़्वाब था वो ख़्वाब ही हो ऐ खुदा

सच है कुदरत से लड़ें हम अपनी ये हस्ती नहीं

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by शिज्जु "शकूर" on May 2, 2014 at 7:19am

आदरणीय सौरभ सर आपका तहेदिल से शुक्रिया


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Comment by Saurabh Pandey on May 2, 2014 at 1:38am

है यही मौका कि बदलें देश की तक़दीर हम

ये न फिर कहना पड़े उम्मीद ही बाकी नहीं

 

गिर पड़ा वो आखरी पत्ता शजर से टूट के

अब रही कोई बहारों की निशानी भी नहीं

भाई शिज्जूजी, कमाल कमाल कमाल !!! .. .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 30, 2014 at 7:55pm

आदरणीया डॉ प्राची जी आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 30, 2014 at 6:48pm

है यही मौका कि बदलें देश की तक़दीर हम

ये न फिर कहना पड़े उम्मीद ही बाकी नहीं........................बहुत खूब! लाजवाब 

 

हाल क्या होगा हमारा गर्म होगी जब धरा

होगा आँखों में समंदर पर कहीं पानी नहीं.....................बहुत सुन्दर 

बेहद बढ़िया ग़ज़ल कही है आ० शिज्जू शकूर जी 

बहुत बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 28, 2014 at 1:46pm

आदरणीया सविता जी आपका हार्दिक आभार

Comment by savitamishra on April 28, 2014 at 12:57pm

बहुत सुन्दर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 28, 2014 at 12:07pm

आदरणीय विजय निकोर सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया जो आपने रचना को सराहा


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 28, 2014 at 12:06pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई रचना की विस्तृत सराहना के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया

Comment by vijay nikore on April 28, 2014 at 11:03am

बहुत ही सुन्दर गज़ल के लिए बधाई।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 28, 2014 at 10:38am

हाल क्या होगा हमारा गर्म होगी जब धरा

होगा आँखों में समंदर पर कहीं पानी नहीं......................बहुत सुंदर

 

गिर पड़ा वो आखरी पत्ता शजर से टूट के

अब रही कोई बहारों की निशानी भी नहीं...................वाह! क्या बात कही है

 

सूख जायेगा चमन होगी हवा में आग सी

फूल होगा याद में बस, खुश्बुएँ होंगी नहीं..............यह अश आर दिल को छू गया

बेहद खुबसूरत गजल आदरणीय शिज्जू जी, तहे दिल से मुबारकबाद

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