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गुप अॅधेंरा, चॉंदनी भी दरबदर

गजल-गुप अॅधेंरा, चॉंदनी भी दरबदर
बह्र....2122 2122 212

नींद जब आती नहीं गुल सेज पर,
सो रहे रिक्शे पे घोड़ा बेच कर।

स्वर्ण है या वोट किसको क्या पता,
शोर संसद में वतन की लूट पर।

चापलूसी नीति निशदिन छल रही,
गर्म है बाजार माया धर्म धर।

शोख कमसिन सी कली नित सुर्ख है,
तल्ख हैं अखबार पढ़ कर मित्रवर।

क्या किया है आपने इस देश में,
लुट रही है अस्मिता हर राह पर।

ताख पर जलता दिया जब बुझ गया,
गुप अॅधेंरा, चॉंदनी भी दरबदर।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 13, 2014 at 3:29pm

क्या खयाल हैं ! और क्या खूब बाँधने की कोशिश हुई है  वाह वाह ! 


लेकिन प्रस्तुतियों में संप्रेषणीयता और कैसे सटीक हो उस के लिए हमें लगातार अभ्यास करते रहना होगा.
एक बानगी क्षमा याचना सहित -
नींद जब आती नहीं गुल सेज पर,
सो रहे रिक्शे पे घोड़ा बेच कर ..

क्या इसे यों कह सकते हैं -
नींद को वे क्या बुलायें सेज पर
सो रहे रिक्शे पे घोड़ा बेच कर
या ऐसा ही कुछ. ..

शुभेच्छाएँ

Comment by Satyanarayan Singh on May 9, 2014 at 3:44pm

आ. केवल प्रसाद जी देश के मिजाज को भांपकर बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही है. हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 3, 2014 at 8:52pm
आ0 शिज्जू भाईजी, आशुतोष भाईजी, जितेन्द्र भाईजी, रेमेश भाईजी, भण्डारी भाईजी तथा आदरणीया कुन्ती मैमजी, आप सभी का तहेदिल से बहुत बहुत आभार। सादर,
Comment by coontee mukerji on May 2, 2014 at 3:32am

बहुत सुंदर रचना. केवल जी हार्दिक बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 29, 2014 at 5:33pm

आदरणीय केवल भाई , लाजवाब ग़ज़ल कही है , आपको हार्दिक बधाइयाँ !!

Comment by रमेश कुमार चौहान on April 29, 2014 at 2:36pm

सभी अश'आर बेहतरीन बन पड़े है आदरणीय केवल जी, दिली दाद कबूल करे

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 29, 2014 at 1:36pm

वाह! बहुत खूब. आज की समस्याओं का बहुत खुबसूरत चित्रण, हार्दिक बधाई आदरणीय केवल जी

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 28, 2014 at 4:48pm

आदरणीय केवल जी 

चापलूसी नीति निशदिन छल रही,
गर्म है बाजार माया धर्म धर।

क्या किया है आपने इस देश में,
लुट रही है अस्मिता हर राह पर।..यथार्थ का चित्रण करती शानदार ग़ज़ल के लिए तहे दिल बधाई सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 28, 2014 at 12:12pm

शोख कमसिन सी कली नित सुर्ख है,
तल्ख हैं अखबार पढ़ कर मित्रवर। बहुत खूब

आदरणीय केवल प्रसाद जी देश के दुर्भाग्य को आपने अशआर मे ढाला है बहुत बहुत बधाई आपको

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