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बहेलिया और जंगल में आग .. :नीरज

जब जब जागी उम्मीदें ,

अरमानों ने पसारे पंख.

देखा बहेलियों का झुंड, 

आसपास ही मंडराते हुए,

समेट  लिया खुद को

झुरमुटों के पीछे.

अँधेरा ही भाग्य बना रहा.

हमारे ही लोग,

हमारे जैसे शक्लों वाले,

हमारे ही जैसे विश्वास वाले,

करते रहे बहेलियों का गुण गान.

उन्हें बताते रहे हमारी कमजोरियों के बारे में

बहेलिये भी हराए जा सकते हैं.

कभी सोचा ही नहीं .

उनकी शक्ति प्रतीत होती थी अमोघ.

जंगल में लगी आग में देखा

बहेलिये को भयाक्रांत

जान बचाकर भागते हुए

बहेलिया भी डरता है,

वह हराया जा सकता है.. 

उठा लिया एक लुआठी.

सबने कहा यह गलत है..

बहेलिये को डराना है अनैतिक.

हम हैं इतने ज्यादा , बहेलिये इतने कम

पर धीरे धीरे जमा होने लगे सभी

बन गयी एक लम्बी श्रृंखला लुआठियों की

भयमुक्त जीना

अपनी संततियों के सुखद भविष्य देखना

अच्छा लगता है .   

अच्छे दिन आ गए.

 

….

नीरज कुमार नीर

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 951

Comment

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Comment by Shyam Narain Verma on May 24, 2014 at 4:31pm
अच्छी प्रस्तुति आदरणीय ,बधाई ............
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 23, 2014 at 12:42pm

भावपूर्ण i अर्थपूर्ण i प्रेरक i

अति सुन्दर  i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 23, 2014 at 10:43am

अगर दिल की माने तो हर दिन अच्छा है नहीं तो नहीं :-))

बहुत अच्छी कविता है आदरणीय नीरज जी बहुत बहुत बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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