हे भगवन वर दीजिए, रहे सुखी संसार |
घर परिवार समाज पे, बरसे कृपा अपार ||
दीन दुखी कोई न हो, ना सूखे की मार |
अम्बर बरसे प्रेम से, भरे अन्न भण्डार ||
कृपा करो हे शारदे, बढ़े कलम की धार |
अक्षर चमके दूर से, शब्द मिले भरमार ||
बेटी सदन की लक्ष्मी, मिले उसे सम्मान |
रोती जिस घर में बहू, होती विपत निधान ||
मीना पाठक
मौलिक अप्रकाशित
(दोहों पर एक छोटा सा प्रयास है )
Comment
आदरणीया मीना पाठक जी आपको बहुत बहुत बधाई अच्छी दोहावली रची है आपने।
मेरी समझ के अनुसार मात्रा गणना तो सही लग रही हैं लेकिन क्षमा सहित, क्या सुख को सु्क्ख कहा जा सकता है?
आदरणीया मीना जी बहुत सुंदर दोहे। … हार्दिक बधाई ..
वाह !! आ0 मीना दी , बहुत खूब दोहे लिखे । किन्तु मात्राओं को पुनः जाँचना होगा ।
ग्रामर के बारे में तो सुध्िाजन ही जाने परन्तु मेरे लिए तो एक एक दोहा "लक्ख लक्ख रूपये दा"
सुंदर तथा आवश्यक. बधाई आ० मीना जी.
वर्तमान परिपेक्ष्य में रचित सुंदर दोहे। … हार्दिक बधाई .... आदरणीया मीना जी क्षमा सहित कृपया विषम चरणों की मात्राओं पुनः जांच लें। …। प्रथम दोहे के द्वितीय विषम चरण का अंत गुरु से होना चाहिए .... जांच लें . संक्षेप में दोहों पर आपका प्रयास सराहनीय है … हार्दिक बधाई इस सृजन हेतु। कृपया अन्यथा न लें।
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