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समय बीतता गया... (विजय निकोर)

समय बीतता गया...

समय की आँधी क्रान्तियात्रा-सी

धुन्धले पड़ते

प्रतीक्षा और मृत्यु के सीमान्त

लड़खड़ाता साहस, विश्वास

ऐसे में स्नेह को आँधी में

दोनों हाथों से लुटा कर

कुछ मिलता है क्या

आत्मपीड़न के सिवा ?

अकेलापन

कसैलापन रसता

बचा रह जाता है

बीतती मुस्कान ओंठों पर

खाली बोतलों के पास

टूटे हुए गिलास-सी पड़ी ...

            -------

-- विजय निकोर

(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 808

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 2, 2014 at 10:57am

आ० भाई विजय जी इस हृदयस्पर्शी और सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई l

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 2, 2014 at 10:52am

बहुत सुंदर, सजीव सा चित्रण. सच समय कहाँ ठहरा है वो तो...... बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय विजय जी

Comment by savitamishra on July 2, 2014 at 10:25am

बहुत सुन्दर आदरणीय


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 2, 2014 at 8:52am

हृदयस्पर्शी रचना के लिये आपको बहुत बहुत बधाई

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