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ग़ज़ल: हवा का शौक जब पर कुतरना हो गया है

हवा का शौक जब पर कुतरना हो गया है

तभी से इंकलाबी परिन्दा हो गया है

 

वो मेरी रहगुजर का उजाला हो गया है

उसे है जब भी देखा सवेरा हो गया है

 

तुम्हारे बिन गुजारा हमारा हो गया है

हमें जीनें का पक्का इरादा हो गया है

 

यहाँ बस्ती जली थी औ' ये अख़बार चुप था

तिरा आना ख़बर में धमाका हो गया है

 

शराफ़त,सच व ईमां हो सीरत आदमी की

मियाँ किस वहम में हो तुम्हें क्या हो गया है

 

ये मौसम संगदिल है या सूरज की है साजिश

पिघलकर आज शबनम कुहासा हो गया है

 

कोई कब है टिका जब भी आया दौरे तूफाँ

मदारी था जो कल तक जमूरा हो गया है

मौलिक वा अप्रकाशित 

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Comment by शिज्जु "शकूर" on July 8, 2014 at 10:54pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय भुवन भाई दिली दाद कुबूल करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 7, 2014 at 8:07pm

आदरणीय भुवन भाई , खूब सूरत  गज़ल कही है  , बधाइयाँ । बह्र जाने बिना अधूरापन लग रहा है ॥

Comment by Ravi Prabhakar on July 7, 2014 at 6:25pm

बहुत खूब भुवन भाई, मजा आ गया;  बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 7, 2014 at 5:44pm

waah kya baat ..bahut khoob 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 7, 2014 at 2:19pm

यहाँ बस्ती जली थी औ' ये अख़बार चुप था

वो छींका और ख़बर में धमाका हो गया है

v

शराफ़त,सच व ईमां हो सीरत आदमी की

मियाँ किस वहम में हो तुम्हें क्या हो गया है,,,आदरणीय भुवन जी कमाल की ग़ज़ल ..हर शेर उम्दा है ..बिशेष रूप से मुझे ये शेर बेहद पसंद आये ..आपको ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ सादर 

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 6, 2014 at 5:28pm

आदरणीय भुवन भाई अच्छी ग़ज़ल कही है आपकी इससे पहले काफी अच्छी गज़लें पढ़ चुका हूँ इस बार मेरे मन का पाठक संतुष्ट नहीं हो सका ग़ज़ल अधपकी सी लगी. खैर प्रयास हेतु बधाई स्वीकारें.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 6, 2014 at 12:28pm

भुवा निस्तेज जी

बड़ी सुदर गजल हुई  है  i  प्रयास जारी रखे i

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