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दोष थोड़ा सा समय का कुछ मेरी आवारगी

सीधे-सीधे चल न पायी इसलिए भी जिंदगी

**

हम  तुम्हें  कैसे कहें  अब  दूरियों  को  पाट लो

कम न कर पाये जो खुद हम आपसी नाराजगी

**

कल हवा को भी  इजाजत  दी न थी यूँ आपने

आज  क्यों  भाने  लगी   है  गैर की मौजूदगी

**

रात-दिन  करने  पड़ेंगे यूँ जतन कुछ तो हमें

कहने भर से दोस्तों  ये किस्मतें कब हैं जगी

**

घर  जलाकर  आप  नाहक  जा रहे हैं साथ में

ये सियासत तो न होगी आपकी फिर भी सगी

**

पुरअसर होगी ‘मुसाफिर’ के जिगर पर भी सदा

हर गजल  यारो  किसी के प्यार में गर हो पगी

**

(रचना - 17 जनवरी 2010)

मौलिक और अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 939

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 16, 2014 at 11:20am

आ0 बहन कल्पना जी , स्नेहाशीष और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 16, 2014 at 11:19am

आ0 भाई विजय शंकर जी, प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 16, 2014 at 11:18am

आ0 भाई शिज्जु जी उत्साह वर्धन के लिए आभार । काफियाबंदी का पर्याप्त ज्ञान नहीं । मैंने तो अ स्वर को बतौर काफिया और गी को रदीफ समझकर यह गजल लिखी थी । इस विषय में कुछ अधिक बताकर ज्ञानवर्धन कराएं तो आभारी रहूंगा ।

Comment by vijay nikore on July 13, 2014 at 4:42pm

बहुत खूबसूरत खयाल हैं। इस अच्छी गज़ल के लिए बधाई।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 13, 2014 at 9:38am

वाह! आदरणीय लक्ष्मण जी, हर एक शेर बहुत खूब हुआ. दिली बधाई आपको

Comment by Santlal Karun on July 12, 2014 at 8:37pm

आदरणीय लक्ष्मण जी,

अच्छी-सी  ग़ज़ल  के लिए साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

"दोष थोड़ा सा समय का कुछ मेरी आवारगी

सीधे-सीधे चल न पायी इसलिए भी जिंदगी"

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 11, 2014 at 4:48pm

बहुत सुन्दर गज़ल हुई है , आपको दिली बधाइयाँ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 10, 2014 at 9:46pm

आप शायद किस्मतें लिखना चाह रहे थे ,टंकण त्रुटी है 

हम  तुम्हें  कैसे कहें  अब  दूरियों  को  पाट लो

कम न कर पाये जो खुद हम आपसी नाराजगी-----बहुत सुन्दर 

**

कल हवा को भी  इजाजत  दी न थी यूँ आपने

आज  क्यों  भाने  लगी   है  गैर की मौजूदगी----शानदार 

सुन्दर ग़ज़ल हुई आ० लक्ष्मण भैय्या ,तहे दिल से बधाई 

**


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 10, 2014 at 7:43pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , बहुत सुन्दर गज़ल हुई है , आपको दिली बधाइयाँ ॥

घर  जलाकर आप  नाहक  जा रहे हो साथ में   ---   को- --  आप नाहक़ जा रहें हैं साथ में  - करना उचित होगा मेरे खयाल से । 

Comment by कल्पना रामानी on July 10, 2014 at 6:57pm

हम  तुम्हें  कैसे कहें  अब  दूरियों  को  पाट लो

कम न कर पाये जो खुद हम आपसी नाराजगी

**

कल हवा को भी  इजाजत  दी न थी यूँ 

आज  क्यों  भाने  लगी   है  गैर की मौजूदगी...

बहुत शानदार शेर कहे हैं आपने आपने आदरणीय धामी जी, मन से बधाई स्वीकार कीजिये

कृपया ध्यान दे...

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