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कौन छोड़ा इस हवस के आदमी ने - गजल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर ’ )


2122    2122    2122

**************************
घाट सौ-सौ  हैं  दिखाए  तिश्नगी  ने
कौन छोड़ा  इस  हवस के आदमी ने
**
करके  वादा   रोशनी  का हमसे यारो
रोज  लूटा  है   हमें   तो   चाँदनी ने
**
राह बिकते मुल्क  के सब रहनुमा अब
क्या किया ये  खादियों  की  सादगी ने
**
रात जैसे  इक  समंदर  तम  भरा  हो
पार जिसको नित  किया आवारगी ने
**
झूठ को जीवन दिया है इसतरह कुछ
यार  मेरे  सत्य को  अपना  ठगी ने
**
पास आना था हमें  यूँ भी कठिन पर
दूर   रक्खा   आप  को   नाराजगी ने
**

रचना मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर ’

Views: 769

Comment

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Comment by vijay nikore on July 27, 2014 at 5:37pm

इस बहुत सुन्दर गज़ल के लिए बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 27, 2014 at 9:33am

सभी आदरणीय विद्व जनों को उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद . आप सभी को ग़ज़ल पसंद आई यह मेरे लिए अति प्रशन्नता का विषय है .आप सभी का सुभाशीष पाकर धन्य हुआ . शुभ.. शुभ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 23, 2014 at 1:40pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , पूरी गज़ल बहुत शानदार कही है , बधाइयाँ ॥

करके  वादा   रोशनी  का हमसे यारो
रोज  लूटा  है   हमें   तो   चाँदनी ने
*राह बिकते मुल्क  के सब रहनुमा अब

क्या किया ये  खादियों  की  सादगी ने

पास आना था हमें  यूँ भी कठिन पर
दूर   रक्खा   आप  को   नाराजगी ने ---------- लाजवाब शे र , आपको ढेरों दाद ॥

Comment by someshwar pandeya on July 23, 2014 at 10:29am
राह बिकते मुल्क के सब रहनुमा अब
क्या किया ये खादियों की सादगी ने..................बहुत खूब
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 22, 2014 at 7:28pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी ,
बात है " खादियों की सादगी " ने. सुन्दर रचना के लिए बधाई।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 22, 2014 at 3:32pm

इन दो शेरों ने बहुत ही प्रभावित किया है -

करके वादा रोशनी का हमसे यारो
रोज लूटा है हमें तो चाँदनी ने ... . 

पास आना था हमें यूँ भी कठिन पर
दूर रक्खा आप को नाराजगी ने

इस ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई, आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी..

शुभ-शुभ

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 22, 2014 at 11:15am

धामी जी

अति सुन्दर i आखिरी शेर कमाल है i

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 22, 2014 at 8:32am

आदरणीय लक्ष्मण जी वर्तमान परिदृश्य को रचना के माध्यम से बखूबी चित्रित किया है आपने ..इस रचना पर मेरी तरफ से हार्दिक बधाई स्वीकार करे सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 21, 2014 at 9:39pm

आज को बयां  करती हुई गजल, हर एक शेर बहुत लाजवाब। दिली बधाइयाँ आपको आदरणीय लक्ष्मण जी

करके  वादा   रोशनी  का हमसे यारो
रोज  लूटा  है   हमें   तो   चाँदनी ने..............सच! इंसान की फितरत

राह बिकते मुल्क  के सब रहनुमा अब
क्या किया ये  खादियों  की  सादगी ने.........ढोंगियों से भगवान बचाये

झूठ को जीवन दिया है इसतरह कुछ
यार  मेरे  सत्य को  अपना  ठगी ने.........बहुत कुछ कह दिया :))


Comment by Santlal Karun on July 21, 2014 at 9:32pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी,

शे'र दर शे'र बड़े तरतीब से कहे गए हैं --

"घाट सौ-सौ  हैं  दिखाए  तिश्नगी  ने
कौन छोड़ा  इस  हवस के आदमी ने
**
करके  वादा   रोशनी  का हमसे यारो
रोज  लूटा  है   हमें   तो   चाँदनी ने"

...हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

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