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बैसाखियाँ- डा० विजय शंकर

बैसाखियाँ बैसाखियाँ बैसाखियाँ ,
हर तरफ बैसाखियाँ ,
उनके लिए जिन्हें जरुरत है ,
उनकें लिए भी , जिन्हें जरुरत नहीं है .
लोगों को बैसाखियों की जरुरत हो न हो
बैसाखियों को तो सबकी जरुरत है.
सब उन्हें लें , उनके सहारे आगे बढ़ें ,
अन्यथा बिलकुल न बढ़ें , नहीं तो ,
बढ़ना क्या , चलने लायक नहीं रह जायेगें .
फिर हमारे पास , हमको लेने आयेंगें .
हमें समझें , हमारा महत्व समझें ,
क्यों हमारा धंधा खराब करते हैं

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर


.

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Comment

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Comment by Santlal Karun on July 23, 2014 at 4:05pm

आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी,

अपील करती अच्छी रचना; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 23, 2014 at 2:52pm

आदरणीय डॉ० विजय शंकर जी 

बैसाखियों की आवश्यकता हो ना हो..... पर आज के व्यावसायिक युग में बैसाखियाँ खुद ही अपनी ज़रुरत आरोपित करती सी दीखती हैं.... फिर बाध्य होना ही पड़ता है बैसाखियों की मदद लेने को.

इस बिम्बात्मक अभिव्यक्ति के लिए बधाई.

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 23, 2014 at 1:53pm
आदरणीय डॉ o गोपाल नरायन जी ,
हालात यही हैं। बिना उनकीं कृपा के कुछ हो नहीं सकता।
शुभकामनाओं हेतु धन्यवाद .
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 23, 2014 at 11:28am

आदरणीय विजय  जी

बहुत पते की बात  और फिर -

हमें समझें , हमारा महत्व समझें ,
क्यों हमारा धंधा खराब करते हैं

कृपया ध्यान दे...

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