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प्रेम अगन करती सदा, चेतन का विस्तार

रोम-रोम तप भाव-तन, धरे नवल शृंगार

 

मैं-तुम भेद-विभेद हैं, मायावी मद भ्राम

द्वैत विलित अद्वैत सत, चिदानन्द अविराम

 

सूक्ष्म धार ले स्थूल तन, पराश्रव्य हो श्रव्य

गुह्य सहज प्रत्यक्ष हो, सधें नियत मंतव्य 

डॉ० प्राची 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 17, 2014 at 8:25pm

बहुत सुन्दर सार्थक दोहे हार्दिक बधाई ,बहुत दिनों बाद आपकी रचना आई ओबिओ पर बहुत  ख़ुशी लाई .

Comment by somesh kumar on October 17, 2014 at 8:18pm

सुंदर अर्थपूर्ण दोहे,एक कोशिश आप के दोहों को अपने शब्दों में कहने की 

चेतना जल उठी प्रेम की आग से 

मैं निखरने लगी तेरे अनुराग से 

मैं-तुमसे पृथक कहीं भी नही 

आत्मा-जिस्म के बिना कुछ नहीं 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 17, 2014 at 7:46pm

आ० डॉ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी 

दोहों में सन्निहित भावार्थ को आपकी स्वीकार्यता मिली आपकी आभारी हूँ

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 17, 2014 at 7:42pm

आ० डॉ० विजय शंकर जी 

दोहों को आपके पाठक नें स्वीकार किया और आपसे सराहना मिली 

इस उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 17, 2014 at 7:41pm

आ० श्याम नारायण वर्मा जी 

दोहों पर आपकी सराहना के लिए धन्यवाद 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 17, 2014 at 11:47am

आदरणीया प्राची जी

बहुत दिनों बाद आपकी रचना से साक्षात्कार हुआ  i

प्रेमाग्नि का संबल पाकर भावरूपी शरीर  नया  शृंगार करती है  i द्वैत-अद्वैत जब  मिल जाते है तभी अविराम सच्चिदानंद की प्राप्ति होती है i भौतिक शरीर जब सूक्ष्म की ओर बढ़ता है तब श्रव्यातीत श्रव्य हो जाता है i अनाहत नाद सुनायी पड़ता है और गोपनीयता तिरोहित हो जाती है  i  दोहे है या अध्यात्म की पिटारी  i  साधुवाद i

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 17, 2014 at 10:54am

 सधें नियत मंतव्य "बहुत खूब , तीनों ही दोहे बहुत सुन्दर हैं , बधाई आदर डॉo प्राची सिंह। 

Comment by Shyam Narain Verma on October 17, 2014 at 10:08am

बहुत सुंदर दोहें हार्दिक बधाई स्वीकार करें...

 सादर..............

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