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मेरे दिल से ये भी न पूछिए, कि जला कहाँ ये बुझा कहाँ,
जो शरर था आग़ था ख़ाक है लगी इसको ऐसी हवा कहाँ.
.

कई संग उठे हैं मेरी तरफ़, कई उँगलियाँ मेरी ओर हैं,  
जो सज़ा मिली है गुनाह की वो गुनाह मैंने किया कहाँ.
.

मेरे लडखडाने की देर है, मुझे मयपरस्त कहेंगे सब,
उन्हें क्या पता मुझे इश्क़ है, कभी जाम मैंने छुआ कहाँ.     
.  

जो ख़ुदा कहे यहीं जम रहूँ, जो इशारा हो अभी चल पडूँ,
ये जो वक़्त है ये घड़ी का है, ये कभी किसी का हुआ कहाँ.   
.

ये सदाएँ हैं मेरी आहों की मेरी ग़ज़लें तेरी अदाएँ हैं,
मेरे आंसुओं की लक़ीरें हैं कोई शेर मुझ से बना कहाँ.  
.

ज़रा पलकों का ये वरक़ हटा, कभी आँखों में भी तो झाँक ले, 
ये क़सीदे हैं तेरी शान में, अभी तू ने इनको पढ़ा कहाँ. 
.

कभी शुहरतो की शराब थी, कभी हुस्न हुस्न तिलिस्म थे,  
मेरी मंज़िलो पे नज़र रही कोई जादू मुझ पे चला कहाँ
.

वो भी सरफिरा मैं भी सरफिरा, वो भी नूर है मैं भी ‘नूर’ हूँ, 
वो भी आईना मैं भी आईना, वो भी खुल के मुझ से मिला कहाँ.  
.
निलेश "नूर"
 

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 1, 2014 at 11:14am

शुक्रिया गुमनाम जी, नरेन्द्र सिंह जी, सारथि जी, डॉ. गोपाल नारायण जी, उमेश जी,  सौरभ सर, डॉ. आशुतोष मिश्र जी, आ. गिरिराज जी.
बस इसी दाद के लिए हर कवि और  शायर रचता है ...यही उसकी सांसों का ईंधन है ..
कोटिश: धन्यवाद  

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 1, 2014 at 11:11am

शुक्रिया आ. श्याम नारायण जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 1, 2014 at 5:50am

आदरनीय नीलेश भाई , हर शे र बेमिसाल है , पूरी गज़ल के लिये दिली बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 31, 2014 at 4:56pm

आदरणीय नूर जी कल इस रचना को पढ़ा था आज मेरा मन बरबस फिर यहाँ आ गया ..कई बार गुनगुनाया ..वाकई कमाल की ग़ज़ल 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 30, 2014 at 11:37pm

हर शेर पर अलग-अलग दाद ...

मगर ये तो इनमें भी विशेष - 

ये सदाएँ हैं मेरी आहों की मेरी ग़ज़लें तेरी अदाएँ हैं,
मेरे आंसुओं की लक़ीरें हैं कोई शेर मुझ से बना कहाँ.  

मक्ता भी वाह वाह !  .. दिल से बधाई, आदरणीय

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 30, 2014 at 3:15pm

अगर इक्जामनर होता

तो नंबर दस में दस देता

नजाकत के अलग देता

लियाकत के अलग देता ----------संग्रहणीय गजल है i

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 30, 2014 at 10:56am

सभी साथियो का दिल से शुक्रिया ..

Comment by umesh katara on October 30, 2014 at 9:32am

शानदार जनाब वाहहहहहह

Comment by Saarthi Baidyanath on October 29, 2014 at 10:47pm

क्या शानदार ग़ज़ल हुई है जनाब , माशा-अल्लाह ! दिली दाद कुबूल फरमायें ... :)

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 29, 2014 at 9:07pm

आदरणीय नूर जी .आपकी एक और बेहतरीन ग़ज़ल ..रूमानियत से भरी इस ग़ज़ल के हर शेर पर मेरी तरफ से हार्दिक बधाई सादर 

कृपया ध्यान दे...

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