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दिल ये बेईमान सताता है.....................

दिल ये बेईमान सताता है
हर पल भटकना चाहता है
डोरी है प्यार की नाजुक सी
कच्ची है कह धमकाता है
हलकी सी भी हवा मिले तो 
हवा के संग बह जाता है


लग जाये ना गैरों की नजर
इस डर से छुपाकर रखा है
मैं लाख सम्हालूँ जतन करूँ
मुझको ही भ्रम दे जाता है


देखूं तो दुनिया फरेबी है
देता चाहतों का हवाला है
रस्मों का बड़ा सा ताला है
जिसे द्वार पे मैंने डाला है


लगती है आँच जमाने की
मैंने आँसुओं से पाला है
सूख रहे दिल के सोते
चाहतों का बोलबाला है


तेरे ही दिल के सागर में
मेरे प्यार का लंगर डाला है
दिल ये बेइमान सताता है
हर पल भटकना चाहता है    

@सरिता पन्थी

 "मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Mohinder Kumar on November 7, 2014 at 4:07pm
मन चँचल मन बाँवरा, मन ठहरा चितचोर

मन की मति चलिये नहीँ पलक पलक मन और

पर कभी कभी मन को फेरा लगाने के लिये छोड देना चाहिये... लोट के तो घर ही आयेगा.

सुन्दर भाव भरी रचना
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 6, 2014 at 8:18am

बहुत सुंदर भाव उभर कर आये, आपकी रचना में. बधाई आदरणीया सरिता जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 5, 2014 at 4:21pm

कविता  आपकी कोशिश बयां करती  है i यह कोशिश जारी रहे i  कवि धीरे-धीरे निखरता है i

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 4, 2014 at 12:30pm

सुंदर गीत रचना के लिए बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on November 4, 2014 at 11:16am

सुन्दर प्रस्तुति हार्दिक बधाई 

Comment by sarita panthi on November 4, 2014 at 8:28am

शुक्रिया सोमेश जी और सुशील जी मुझे आप सभी की संगत में काफी कुछ सिखने को मिलेगा ऐसी मेरी आशा है .

Comment by sarita panthi on November 4, 2014 at 8:26am

जी शुक्रिया प्रधान सम्पादक जी दिल तो बेईमान है पर दिमाग ने तो उसे लंगर लगाया हुआ है ये कहना चाहती थी शायद अच्छा नही बन पाया पर कोशिश करुँगी की और अच्छा बन सके 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 3, 2014 at 3:02pm

गीत कहने का अच्छा प्रयास है. लेकिन जैसा कि आ० सुशील सरना जी ने भी कहा है कि यह प्रयास और बेहतर हो सकता था।  बहरहाल, प्रयासरत रहे और अभिनन्दन स्वीकार करें।

Comment by Sushil Sarna on November 3, 2014 at 1:04pm

आदरणीय सुंदर गीत और भी सुंदर हो सकता था। प्रयास के लिए बधाई और सोमेश जी से सहमत।

Comment by somesh kumar on November 3, 2014 at 7:38am

आप ने जिस भी अर्थ में लिखा हो पर ये कविता आप के विचारों का विरोध अंत में स्वयं करती है,दिल अगर बेईमान और आवारा है तो तेरे ही दिलके सागर में लंगर कैसे डाल सकता है ,मुझे यहाँ भ्रम लग रहा है ,पूरी रचना विषय के अनुकूल चलती है पर यहीं पर आकर अपने विरुद्ध हो रही है ,पर अगर आप को सही लग रही है तो कोई दिक्कत नहीं 
कोशिश के लिए बधाई |

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