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"यार मैं एक लड़की से प्यार करता हूँ "-सुजीत ने अपने दोस्त विपिन से कहा |

"प्यार, यार आजकल तो प्यार का ज़माना कहाँ हैं,बस मजे ले और उसे छोड़ दे"-विपिन ने उसे समझाते हुए कहा | 

"पर ,यार  मैं उस से प्यार करता हूँ,मैं किसी के साथ धोका नही कर सकता हूँ "-सुजीत ने उदास होते हुए कहा | विपिन -"यार  इसी में तो मजा है ,खैर कौन है वो लड़की मैं भी तो जानूँ "

सुजीत-"तेरी बहन ,यार "

इतना सुन कर विपिन कुछ न बोल सका | उसे एक बड़ी सीख मिल चुकी थी |

"मौलिक व अप्रकाशित "

 

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 30, 2014 at 4:37pm

सुंदर सीख देती  लघु कथा हुई  है | शब्द "धोका" अखर रहा है  | धोखा करले 

Comment by Neeraj Nishchal on November 28, 2014 at 8:46pm
khaaaamoooosh! कर दिया आपने तो भाई बहुत गज़ब ।
Comment by Hari Prakash Dubey on November 27, 2014 at 5:44pm

हार्दिक बधाई महर्षि त्रिपाठी जी,कम शब्दों में अच्छी रचना !

Comment by maharshi tripathi on November 27, 2014 at 4:53pm

मेरी कोशिश पर आप सभी के आशीर्वाद  पर  , आभार प्रकट करता हूँ| 

Comment by maharshi tripathi on November 27, 2014 at 4:52pm

आदरणीय प्रभाकर जी ,आपका स्नेह यूँ ही मिलता  रहा तो आगे जरूर अच्छा लिखेंगे |


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 27, 2014 at 12:43pm

बढ़िया लघुकथा है भाई महर्षि त्रिपाठी जी, लेकिन थोड़ी  कसावट मांग रही है। बहरहाल, इस सद्प्रयास पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकारें।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 27, 2014 at 10:53am

अच्छी सीख मिली जब आसमान सर पे गिरा तो ...बढ़िया लघु कथा ..बहुत बहुत बधाई 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on November 26, 2014 at 10:27pm

सीख देती हुई लघुकथा सही नाम रक्खा आपने!

Comment by maharshi tripathi on November 26, 2014 at 10:09pm

सम्मान के लिए शुक्रिया ,,,"बागी " जी |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 26, 2014 at 10:03pm

इस प्रयास पर बधाई।

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