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गजल ~ बज्म ए मुहब्बत मेँ

122 122 122 122

मुहब्बत मेँ अब क्या से क्या बन गया वो ।
किसी की नजर का खुदा बन गया वो ।

कि अब मन्नतोँ मेँ भी है नाम उसका ,
किसी दिल की माँगी दुआ बन गया वो ।

किसी ने तराशी जो तस्वीर उसकी ,
तो इंसान सबसे जुदा बन गया वो ।

उसे देखकर देखकर चैन पाता है कोई ,
किसी दर्दे दिल की दवा बन गया वो ।

कभी बेवफाई के भी था न काबिल ,
मगर अब किसी की वफा बन गया वो ।

लिखी थी खिजाँओँ ने तकदीर जिसकी ,
बहारोँ की महकी फिजा बन गया वो ।

कहीँ दिल की राहोँ मेँ उसका मकाँ है ,
कि अब आशिकी का पता बन गया वो ।

मौलिक व अप्रकाशित

नीरज मिश्रा

Views: 549

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Comment by गिरिराज भंडारी on December 16, 2014 at 9:46am

बहुत खूब सूरत गज़ल हुई है , आदरणीय नीरज भाई , दिल से बधाई !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 15, 2014 at 11:58am

नीरज जी

बहुत खूब  i बहुत पसंद आयी गजल i हर शेर सवा शेर है i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 13, 2014 at 7:24pm

बहुत खूब, रचना पर आपको  बधाई

Comment by Shyam Narain Verma on December 13, 2014 at 10:20am

बहुत खूब ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, गजल पर आपको दिल से बधाई

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 13, 2014 at 6:56am
कभी बेवफाई के भी था न काबिल
कि अब आशिकी का पता बन गया वो ।
बहुत खूब, आदरणीय नीरज मिश्रा जी, बधाई।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 12, 2014 at 10:43pm

किसी ने तराशी जो तस्वीर उसकी ,
तो इंसान सबसे जुदा बन गया वो ।--वाह्ह्ह्ह 

अच्छी ग़ज़ल हुई है और ये शेर तो कमाल का कहा है 

बधाई आपको 

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 12, 2014 at 10:34pm
किसी ने तराशी जो तस्वीर उसकी ,
तो इंसान सबसे जुदा बन गया वो ।बहुत खूब भाई वाह!
Comment by gumnaam pithoragarhi on December 12, 2014 at 6:06pm

वाह अच्छी ग़ज़ल कही है भाई जी


 कहीँ दिल की राहोँ मेँ उसका मकाँ है ,
कि अब आशिकी का पता बन गया वो ।

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