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जो टूटा सो टूट गया
रूठा सो रूठ गया ।
साथ चले जिस पथ पर थे
आखिर तो वो भी छूट गया ।

गाँव की पगडण्डी वो छूटी , पानी पनघट छूट गया
खेतवारी बँसवारी छूटी, बचपन कोई लूट गया
भर अँकवारी रोई दुआरी ,नइहर मोरा छूट गया ।
जो....


अँचरा अम्मा का जो छूटा ,घर आँगन सब छूट गया
छिप - छिप बाबा का रोना भइया वो बिसुरता छूट गया
तीस उठी है करेजे में ज्यूँ पत्थर कोई कूँट गया ।
जो…।


पाही पलानी मौन हुए मड़ई से छप्पर रूठ गया
सोन चिरईया फुर्र हो गयी कोकिल का स्वर रूठ गया
साँझ से जैसे दियना रूठे बचपन मुझसे छूट गया ।
जो.......

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 29, 2015 at 8:10pm

बहुत ही सुन्दर रचना आदरणीया मंजरीजी...

गाँव की पगडण्डी वो छूटी , पानी पनघट छूट गया

खेतवारी बँसवारी छूटी, बचपन कोई लूट गया

भर अँकवारी रोई दुआरी ,नइहर मोरा छूट गया ।..... बहुत बहुत बधाई ! सादर 

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 25, 2015 at 12:29pm
बहुत मीठा सुन्दर गीत वाह!
Comment by Ram Ashery on January 24, 2015 at 9:13pm

आपके गीत मेरे मन को छू  गया ,

बचपन की याद आज ताजी हो गई 

कोई साथी किसी मोड पर मिल गया 

गाँव गली छोड़ मैं शहर में बस गया

माँ बाप भाई बहन सबकी यादें रह गई

क्या करें मजबूर हैं बस अकेला रह गया  

आपको बहुत बहुत बधाई स्वीकार हो 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2014 at 12:18am

पारम्परिक गीतों में जिस गहराई से बिछोह का दर्द उमड़ा आता है वह विस्मित करता है. आदरणीया मंजरीजी, आपके प्रस्तुत गीत ने ग्रामीण अंचल की मधुरता को साझा किया है, जहाँ भले लोगों की छोटी-छोटी इच्छाओं की तृप्ति से रस पाती भोली-भाली दुनिया बसा करती थी.
हार्दिक बधाइयाँ.

Comment by somesh kumar on December 19, 2014 at 11:45pm

देसज शब्दों के साथ ,छुटने की इस पीड़ा को बड़ी सुन्दरता से शब्द दिए हैं आप ने ,बधाई !

Comment by mrs manjari pandey on December 19, 2014 at 8:08pm
आदरणीय अजय शर्मा जी सारगर्भित टिप्पणी के लिए आभारी हूँ ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 19, 2014 at 12:45am

पाही पलानी मौन हुए मड़ई से छप्पर रूठ गया
सोन चिरईया फुर्र हो गयी कोकिल का स्वर रूठ गया
साँझ से जैसे दियना रूठे बचपन मुझसे छूट गया ।

सुन्दर रचना ... बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by ajay sharma on December 18, 2014 at 11:00pm

साँझ से जैसे दियना रूठे बचपन मुझसे छूट गया ।,,,,,,,,,,,,,,bahut hi marmik aur pratbinbyukta  , bhav praval rachna ne man moh liya    wah wah wah.. 

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