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नयन सखा डरे डरे, प्रमाद से भरे भरे......मिथिलेश वामनकर

नयन सखा डरे डरे, प्रमाद से भरे भरे......

 

सबा चले हजार सू फिज़ा सिहर सिहर उठे

भरी भरी हरित लता खिले खिले सुमन हँसे

चिनार में कनेर में खजूर और ताड़ में

अड़े खड़े पहाड़ पे घने वनों की आड़ में

उदास वन हृदय हुआ उदीप्त मन निशा हरे.............

 

शज़र शज़र खड़े बड़े करें अजीब मस्तियाँ

विचित्र चाल से चले बड़ी विशेष पंक्तियाँ

सदा कही नहीं मगर दिलो-दिमाग कांपता

मधुर मधुर मृदुल मृदुल प्रियंवदा विचिन्तिता

विचारशील कामना प्रसंग से परे परे..........

 

ख़ुदा नहीं मिले कभी सनम जुदा जुदा रहे

अस्वस्थ व्यस्त सा हृदय सदा पिया पिया कहे

अजीब इश्क शै खुदा मिला कभू जुदा कभू

पिया प्रभु से हो गए कि हो गए पिया प्रभु

असीम एक नाम से विरक्त मन जगत तरे.........

 

सुखन, ग़ज़ल, कता ख़ुदा नजीब अर्जमंद से 

अकाट्य तथ्य से महीन शब्द अर्थ द्वन्द से

खला नहीं नज़र नज़र मगर करे असर खला

असाध्य साधना नहीं तथापि कर्म बावला

निपंग साधना यहाँ विकल्प से सदा डरे...........

 

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(मौलिक व अप्रकाशित) © मिथिलेश वामनकर 
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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 10, 2015 at 7:37pm

आदरणीय  harivallabh sharma सर जी आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार धन्यवाद


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 10, 2015 at 7:35pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव  सर  नवगीत के इस प्रयास पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया, स्नेह और आशीर्वाद के लिए हार्दिक आभार... नमन .... आपने सही कहा ये पञ्चचामर छंद की तर्ज पर ही नवगीत का प्रयास है.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 10, 2015 at 7:31pm

आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी नवगीत के इस प्रयास पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार... आपने सही कहा कांपता और विचिन्तिता .....तथा.... कभू और प्रभु की तुकांतता में सुधार की आवश्यकता है ... यह विचार आया था पर नवगीत में इतनी छूट मानकर प्रयोग कर लिया पुनः सुधार का प्रयास करता हूँ.... रचना के मर्म पर आपकी सकारात्मक टिप्पणी से अभिभूत हूँ. नमन.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 10, 2015 at 7:26pm

आदरणीय  Shyam Narain Verma  जी नवगीत के इस प्रयास पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 10, 2015 at 7:11pm
आदरणीय दिनेश भाई जी आपको यह प्रयास पसंद आया हार्दिक आभार। बहुत बहुत धन्यवाद।
Comment by gumnaam pithoragarhi on January 10, 2015 at 6:38pm

 

ख़ुदा नहीं मिले कभी सनम जुदा जुदा रहे

अस्वस्थ व्यस्त सा ह्रदय सदा पिया पिया कहे

वाह सर खूबसूरत रचना के लिए बधाई

Comment by Hari Prakash Dubey on January 10, 2015 at 6:03pm

आ० मिथिलेश वामनकर जी , आनंद आ गया ,सुन्दर गीत , दिल से बधाई आपको !

Comment by Ram Ashery on January 10, 2015 at 5:10pm

अति सुंदर रचना आपको बहुत बहुत बधाई हो 

Comment by harivallabh sharma on January 10, 2015 at 3:27pm

मन मोहिनी रचना के बधाई आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 10, 2015 at 2:54pm

आ०  वामनकर जी

सुखन, ग़ज़ल, कता ख़ुदा नजीब अर्जमंद से 

अकाट्य तथ्य से महीन शब्द अर्थ द्वन्द से

खला नहीं नज़र नज़र मगर करे असर खला

असाध्य साधना नहीं तथापि कर्म बावला

निपंग साधना यहाँ विकल्प से सदा डरे...........बहुत सुन्दर रचना i  हिन्दी का  'पंच चामर'  छंद है यह  i  बधाई  रचनाकार i

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