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"आत्मायें बिक चुकीं हैं"

आत्मायें,

बिक चुकीं हैं,

बेचीं जा रहीं हैं,

कुछ असहाय,बिचारीं हैं,

कुछ म्रत्प्रायः,

कुछ मर चुकी हैं !

शरीर,

उन मृत आत्माओं का,

बोझ ढोए जा रहें हैं !

शब्द,

खो चुके अपना अर्थ,

उन अर्थहीन शब्दों से,

अच्छे दिनों के नारे लगा रहें हैं !

पैर,

चलना नहीं चाहते,

उन अनिच्छुक पैरों को ,

अच्छे दिनों की आस में,

कंटक पथों पर जबरन चला रहें हैं !

ईश्वर,

रंगमंच पर विद्यमान है,

नाटक वही है,

दृश्य पर दृश्य,

बदलते जा रहें हैं !

लोग,

घायल दिलों से,

सवाल कर रहें हैं,

अच्छे दिन कब आ रहें हैं ?

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

 

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Comment

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on January 14, 2015 at 8:49pm

कब आएंगे अच्छे दिन? इन्तजार रोज नए सपने और इन सपनों के जाल में उलझते जा रहे हम सभी ... राजनीति है बुरी. पर बिना इसके न चलती धरा, आखिर कहाँ है उसकी धुरी .एक ईमानदार व्यक्ति, लड़ रहा, खा रहा थपेड़े, दिन रात!

Comment by Hari Prakash Dubey on January 14, 2015 at 8:25pm

आपका बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश जी ! आपके हर शब्द से मुझे उत्साह मिलता है ,सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on January 14, 2015 at 7:59pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर जी, रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु  सादर धन्यवाद ! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 14, 2015 at 12:38pm

आ. हरि प्रकाश भाई , वाह ! क्या बात कही है ,

ईश्वर,

रंगमंच पर विद्यमान है,

नाटक वही है,

दृश्य पर दृश्य,

बदलते जा रहें हैं !

लोग,

घायल दिलों से,

सवाल कर रहें हैं,

अच्छे दिन कब आ रहें हैं   -  बहुत खूब ! बधाई स्वीकार करें

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 14, 2015 at 11:50am

नाटक वही है,

दृश्य पर दृश्य,

बदलते जा रहें हैं !

लोग,

घायल दिलों से,

सवाल कर रहें हैं,

अच्छे दिन कब आ रहें हैं ?------------------------ sundar bhav  !

 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 14, 2015 at 11:49am

इस अच्छी रचना के लिए बहुत बहुत बधाई ... आ० भाई हरी प्रकाश जी , सादर l

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 14, 2015 at 11:33am
सुन्दर , बधाई , आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, सादर।
Comment by Shyam Narain Verma on January 14, 2015 at 10:55am

बहुत मार्मिक ...अच्छी रचना है बहुत बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 14, 2015 at 10:49am
बेहतरीन कविता। अच्छे दिनों की आस पर सही चोट करती और वास्तविकता को उजागर करती कविता। आदरणीय हरिप्रकाश दुबे जी हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति पर।

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