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ग़ज़ल: कोई पत्थर और कोई आईने ले के(भुवन निस्तेज)

कोई पत्थर और कोई आईने ले के
आ रहा हर एक अपने दायरे ले के

यूँ चले हो रात को दीपक बुझे ले के
खुद अँधेरा भी परेशाँ है इसे ले के

बस ठिठुरते रह गए दरवाजे बाहर ख्वाब
ये सुबह आई है कितने रतजगे ले के

जिंदगानी तंग गलियां भी न दे पाई
मौत हाजिर हो गई है हाइवे ले के

आपका आना तो कल ही सुर्ख़ियों में था
आज फिर अख़बार आया हादसे ले के

साकिया यूँ बेरुखी से मार मत हमको
रिन्द जायेगा कहाँ ये प्यास ले ले के

कुछ न कुछ देकर उन्हें खुश कर रहे थे लोग
हमने उनको खुश किया कुछ मशविरे ले के

गांव की पगडंडियों में खो गया हूँ मैं
माज़ी की यादों के मीठे ज़ायके ले के

लग रहे हैं पांव भी ये बोझ अब उनको
जो चले ही थे इरादे अनमने ले के

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by MUKESH SRIVASTAVA on January 17, 2015 at 11:25am

khoobsoorat mitra - badhaee

Comment by Madan Mohan saxena on January 16, 2015 at 3:37pm

वाह , बहुत खूब ग़ज़ल कही है बधाई

जिंदगानी तंग गलियां भी न दे पाई
मौत हाजिर हो गई है हाइवे ले के

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 16, 2015 at 3:34pm


 जिंदगानी तंग गलियां भी न दे पाई
मौत हाजिर हो गई है हाइवे ले के-------------------- bilkul nayee kalpna  , bahut sundar

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 16, 2015 at 7:53am


जिंदगानी तंग गलियां भी न दे पाई
मौत हाजिर हो गई है हाइवे ले के

वाह भुवन भाई जी बहुत खूब ग़ज़ल कही है बधाई

Comment by Hari Prakash Dubey on January 15, 2015 at 8:34pm

आपका आना तो कल ही सुर्ख़ियों में था

आज फिर अख़बार आया हादसे ले के......आदरणीय भुवन निस्तेज जी सुन्दर रचना ,बधाई आपको !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 15, 2015 at 8:27pm

आदरणीय भुवन जी बेहतरीन ग़ज़ल हुई है .... शेर दर शेर दाद कुबूल कीजिये 

मतला उम्दा  हुआ है ....

ये अशआर तो कमाल हुए है -

जिंदगानी तंग गलियां भी न दे पाई
मौत हाजिर हो गई है हाइवे ले के............... वाह्ह 

कुछ न कुछ देकर उन्हें खुश कर रहे थे लोग
हमने उनको खुश किया कुछ मशविरे ले के..... बहुत खूब 

लग रहे हैं पांव भी ये बोझ अब उनको
जो चले ही थे इरादे अनमने ले के...... उम्दा 

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