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प्यार का समन्दर हो .....

प्यार का समन्दर हो .....

किसको लिखता
और क्या लिखता
भीड़ थी अपनों की
पर कहीं अपनापन न था
एक दूसरे को देखकर
बस मुस्कुरा भर देना
हाथों से हाथ मिला लेना ही
शायद अपनेपन की सीमा थी
खोखले रिश्ते
बस पल भर के लिए खिल जाते हैं
इन रिश्तों की दिल में
तड़प नहीं होती
यादों का बवण्डर नहीं होता
बस एक खालीपन होता है
न मिलने की चाह होती है
न बिछुड़ने का ग़म होता है
इसलिए ट्रेन छूटने के बाद
मैंने उसे देने के लिए
हाथ में दबाया हुआ प्रेम पत्र
जो मेरी हथेली के पसीने से
गीला हो गया था
जिसके अक्षर
मिलन से पहले ही
पिघल गए थे
उस निष्ठुर पटरी पर
बिना किसी कसक के
मैंने हवा में उड़ जाने के लिए
गिरा दिया
फिर खुद ही
अपने हाल पे मुस्कुरा दिया
और चल दिया
एक सच्चे
रिश्ते की तलाश में
जिसमे अपनेपन की मिठास हो
मिलने की चाह हो
बिछुड़ने का दर्द हो
यादों का बवण्डर हो
प्यार का समन्दर हो

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 716

Comment

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Comment by Sushil Sarna on January 20, 2015 at 2:53pm

आदरणीय  Hari Prakash Dubey   जी रचना पर आपकी प्रशंसात्मक अभिव्यक्ति  के लिए आपका हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on January 20, 2015 at 2:52pm

आदरणीय Dr Ashutosh Mishra   जी रचना में निहित भावों को इतना मान देने के लिए आपका हार्दिक आभार। 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 20, 2015 at 12:10pm

इसलिए ट्रेन छूटने के बाद
मैंने उसे देने के लिए
हाथ में दबाया हुआ प्रेम पत्र
जो मेरी हथेली के पसीने से
गीला हो गया था
जिसके अक्षर
मिलन से पहले ही
पिघल गए थे
उस निष्ठुर पटरी पर
बिना किसी कसक के
मैंने हवा में उड़ जाने के लिए
गिरा दिया
फिर खुद ही
अपने हाल पे मुस्कुरा दिया------------------ आप बीती है सरना जी या ------

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 20, 2015 at 8:47am
दुनिया में रिश्ते रिश्ते नहीं रहे ,
जब से रिश्ते पढ़ाये जाने लगे ,
कारोबार का मजबूत हिस्सा बन गए ,
कारोबार में बनाये जाने लग गए ॥
एक सुन्दर प्रस्तुति, आदरणीय सुशील सरना जी , बधाई , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 19, 2015 at 10:56pm
आदरणीय सुशील सरना सर सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करे
Comment by Hari Prakash Dubey on January 19, 2015 at 6:32pm

आदरणीय सुशील सरना सर ,....उस निष्ठुर पटरी पर..बिना किसी कसक के...मैंने हवा में उड़ जाने के लिए...गिरा दिया..फिर खुद ही 
अपने हाल पे मुस्कुरा दिया......सुन्दर रचना  हार्दिक बधाई आपको ! सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 19, 2015 at 6:07pm

और चल दिया
एक सच्चे
रिश्ते की तलाश में
जिसमे अपनेपन की मिठास हो
मिलने की चाह हो
बिछुड़ने का दर्द हो
यादों का बवण्डर हो
प्यार का समन्दर हो ,,मन को छू ललेने वाली इस शानदार रचना के लिए ढेर सारी बधाई 

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