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' मै कभी नहीं मरता ' --अतुकांत -- गिरिराज भंडारी

मै कभी नहीं मरता

******************

आप बच नहीं सकते

उलझने से

ऐसा इंतिज़ाम है मेरा

फैला दिया है मैने मेरा अहंकार हर दिशाओं मे

हर दिशाओं के हर कोणों में

बस मैं हूँ , मैं

 

कहीं भी जायें, उलझेंगे ज़रूर

जब भी कोई उलझता है , मेरे मैं से 

चोटिल करता उसे

तत्काल मुझे ख़बर लग जाती है , और तब

मुझे खड़ा पाओगे तुम उसी क्षण

अपने विरुद्ध

तमाम हथियारों से सुसज्जित

 

ये भी तय है ,

हरा नहीं पाओगे तुम मुझे

कोई नहीं हरा पाया आज तक

मैं मानता ही नहीं हार

 

मै मरता भी नहीं

मैं टूटता हूँ , टुकड़ों में , फिर

पिघलता है मेरा अस्तित्व

तरलता आती है , ठोस में   

फिर मै वाष्प बन जाता हूँ

फैल जाते हैं मेरे कण कण सारे ब्रम्हांड में

और विलीन हो जाता सारा अहम्

उस परम में , परम के अहम् में

फिर से मुझ जैसे किसी एक में आने के लिये ।

*******************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

Views: 617

Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on January 22, 2015 at 8:18pm
बहुत ही दार्शनिक रचना है , मैं जो कुछ है नहीं , वह कभी मरता भी नहीं। बहुत ही चिंतनीय है. बधाई आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , इस प्रस्तुति पर, सादर।
Comment by Hari Prakash Dubey on January 22, 2015 at 8:13pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी सर बहुत ही शानदार दर्शन से सुसज्जित  रचना , हार्दिक बधाई ! सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 22, 2015 at 7:50pm

'अहम' पर बहुत सही चिंतन मनन करती रचना. बधाई आदरणीय गिरिराज जी

Comment by somesh kumar on January 22, 2015 at 7:15pm

जीवन चक्र ,आत्मा-परमात्मा -आत्मा |ख्याल में कितनी व्यापकता |आत्मा-स्वरूप होना ,जहाँ सब कुछ एक खेल है और एक स्थाइत्व भी है |अच्छी रचना |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 22, 2015 at 7:01pm
आदरणीय गिरिराज सर, नए तरीके से अहम् को प्रस्तुत किया। शानदार रचना। हार्दिक बधाई।
Comment by gumnaam pithoragarhi on January 22, 2015 at 6:50pm

वाह खूब है सर ही वाह ............... हर दिशाओं .............या
हर दिशा

Comment by दिनेश कुमार on January 22, 2015 at 6:24pm
लाजवाब रचना, उम्दा सोच, सर जी।
Comment by दिनेश कुमार on January 22, 2015 at 6:20pm
Magar main toh mar chuka hun....

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