हाथ से यूँ सरसराती सी निकाली जिंदगी
खूब कोशिश की मगर कैसे संभाली जिंदगी
लाख पटके पांव फिर भी जो लिखा था वो हुआ
हर तजुर्बे कर के देखे और खंगाली जिंदगी
जिंदगी की राह में चलते हुए ऐसा लगा
है मरासिम कुछ पुराना देखी भाली जिंदगी
है बड़ी बेबाक सी उज्जड गवारों सी लगी
अब मुझे कितना कचोटे एक गाली जिंदगी
.
मौलिक एवं अप्रकाशित
विजय कुमार मनु
Comment
लाख पटके पांव फिर भी जो लिखा था वो हुआ
हर तजुर्बे कर के देखे और खंगाली जिंदगी ------ लाजवाब बात कही , आदरणीय विजय भाई , बधाई ॥
बहुत बढ़िया आदरणीय विजयजी बहुत बहुत बधाई आपको।
मैं भी मिथिलेश जी से सहमत हूँ :-)
ज़िन्दगी गाली की तरह कचोटे यह बात नागवार लगी |गज़ल अच्छी पर इसमें लहजा पूरी तरह शिकायती क्यों ?
बढ़िया अशआर ... सभी बह्र में है.... सिर्फ एक शेर और कह दे तो ग़ज़ल मुकम्मल हो जाए. अरुज के अनुसार ग़ज़ल में कम से कम पांच अशआर होने चाहिए. हरेक शेर में बह्र-ए-रमल के अरकान फाइलातुन-फाइलातुन-फाइलातुन-फाइलुन को क्या खूब निभाया है लगता है आदरणीय विजय जी आप बह्र को खूब जानते है. लग रहा है जैसे पिछली रचना, ग़ज़ल के नाम से हमारी परीक्षा लेने के लिए पोस्ट की गई थी. भाई बहुत खूब. बधाई स्वीकार करे और में शेर-दर-शेर दिल से दाद कुबूल कीजिये.
बढ़िया गजल i
आदरणीय विजय कुमार जी सुन्दर रचना हार्दिक बधाई ! सादर
ज़िंदगी के दर्दीले पक्ष को दर्शाती सुंदर ग़ज़ल आदरणीय … हार्दिक बधाई
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