For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

जिंदगी रेत की मानिंद सरक जाती है
ये मेरी जीस्त हरेक गाम लरज जाती है
तू खफा है तो हुआ कर या रब
सामने मेरे फकत माँ ही काम आती है
ये हुस्न ये शबाब ये नामो शौकत
तूँ बता बाद में मरने के किधर जाती है
मेरी किस्मत है जैसे आंधियो में रेत के घर
जब चमकती है सरे राह बिखर जाती है
यूँ हुआ बेवफा मुझी से जहाँ
याद करता हूँ वफ़ा आँख बरस जाती है
अब मेरा दिल है मेरी जां है और बस मैं हूँ
उसको देखूं कभी ये रूह तरस जाती है
अब तो घर चल बहुत ही रात हुई अब तो मनुु
दूर होता हूँ तभी घर की भी याद आती है
मौलिक एवम अप्रकाशित
विजय कुमार "मनु"

Views: 772

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by umesh katara on January 29, 2015 at 7:54pm

सुन्दर भाव

Comment by दिनेश कुमार on January 28, 2015 at 5:46pm
बहुत अच्छा काम किया भाई मिथिलेश जी।
Comment by vijay on January 28, 2015 at 10:00am
जी डॉ.साहिब मई अमल करूँगा
धन्यवाद
Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 28, 2015 at 9:56am

aadarneey vijay jee is prayas ke liye hardik badhaaayee ..aadarneey mithilesh jee ke mashwire par amal karke aapko nischit hee faaida hoga //haardik shubhkaamnaaon ke sath saadar 

Comment by vijay on January 28, 2015 at 8:21am
आप सभी गुनीजनों का बेहद आभार जो आपने मेरा मार्ग दर्शन किया
एक बार फिरसे धन्यवाद

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 28, 2015 at 12:47am

आदरणीय विजय कुमार 'मनु' जी आपकी रचना पढ़ी. भाव बहुत अच्छे है, तुक भी बढ़िया मिल रहा है. आपकी लेखनी संभावनाओं से भरी हुई है. बस सही दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है.अब आपकी रचना पर बात करें तो यह एक भावनाओं से परिपूर्ण रचना है जो कविता या गीत होने का आभास देती है किन्तु इसे ग़ज़ल नहीं कहा जा सकता. ग़ज़ल में अशआर (बहुत से शेर) होते है, हर शेर दो मिसरों से बनता है. ग़ज़ल का पहला शेर मतला कहलाता है जिसके दोनों मिसरे हमकाफिया और एक ही रदीफ वाले होते है. जैसे आदरणीय खुर्शीद सर की Latest Blog में पोस्ट इस  ग़ज़ल को देखें -

उमंगों के चरागों को बुझाओ मत..... 

उजाले को अँधेरों से डराओ मत...... ये दोनों मिसरे या पंक्तिया मतला है जिसमे मत रदीफ़ और बुझाओ, डराओ का आओ काफिया है यहाँ दोनों मिसरे हमकाफिया है 

 

न फेंको तुम इधर कंकर तगाफ़ुल का          

परिंदे हसरतों के यूं उड़ाओ मत......  बाकी शेर में दूसरा मिसरा हमकाफिया होता है जैसे उडाओं मत का उड़ाओं काफिया व मत रदीफ़ 

 

ग़ज़ल हमेशा बहर में लिखी जाती है अर्थात मात्रा युग्म की आवृत्ति में जैसे इस ग़ज़ल की मात्रा युग्म 1222-1222-1222 है 

1222  / 1222  /    1222

उमंगों के/  चरागों को / बुझाओ मत

उजाले को /अँधेरों से /   डराओ मत

अब आपकी रचना पर बात करे तो इसमें काफिया और रदीफ़ शेर-दर-शेर बदल गए है और बहर का पालन भी नहीं हुआ है.

जैसे आपके रदीफ़ कहीं - जाती है तो कहीं आती है 

काफिया - सरक , लरज, काम, किधर बिखर बरस तरस और याद बनाए है जो बिलकुल अलग अलग है क्योकि इनमे कोई तुकान्त नहीं है. खैर शुरुआत है. यदि आप ग़ज़ल कहना चाहते है तो आप सही मंच पर आये है, यहाँ ग़ज़ल सहित अन्य काव्य विधाओं से सम्बंधित अनमोल खज़ाना भरा पड़ा है. आप ग़ज़ल सीखने के लिए ग़ज़ल की कक्षा और ग़ज़ल की बातें Join करे तो आपको बहुत कुछ मिलेगा. आपको लगेगा खज़ाना हाथ लग गया . सुलभ सन्दर्भ हेतु लिंक दी है 

http://www.openbooksonline.com/group/kaksha

http://www.openbooksonline.com/group/gazal_ki_bateyn

Comment by somesh kumar on January 27, 2015 at 11:31pm

भाई अच्छा प्रयास है ,जिस विधा में लिख रहे हैं उसकी कुछ अच्छी रचनाओं को पढ़े ,नियमों को पढ़े ,जल्दी ही उम्दा साहित्य आपकी कलम से निकलेगा |

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 27, 2015 at 8:48pm
वाकई बहर और काफिया समझ नहीं पाया कृपया शंका समाधान करें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 27, 2015 at 8:08pm

आदरणीय , बहर समझ नहीं पाया , बातें सुन्दर कहीं है , आपको बधाइयाँ ।

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 27, 2015 at 7:59pm
सुन्दर गजल भाई जी

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"ग़ज़ल   बह्र ए मीर लगता था दिन रात सुनेगा सब के दिल की बात सुनेगा अपने जैसा लगता था…"
13 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे…See More
13 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
" दोहा मुक्तक :  हिम्मत यदि करके कहूँ, उनसे दिल की बात  कि आज चौदह फरवरी, करो प्यार…"
14 hours ago
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"दोहा एकादश. . . . . दिल दिल से दिल की कीजिये, दिल वाली वो बात । बीत न जाए व्यर्थ के, संवादों में…"
16 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"गजल*****करता है कौन दिल से भला दिल की बात अबबनती कहाँ है दिल की दवा दिल की बात अब।१।*इक दौर वो…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"सादर अभिवादन।"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"स्वागतम"
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"  आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी सादर नमस्कार, रास्तो पर तीरगी...ये वही रास्ते हैं जिन…"
yesterday
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Feb 8

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service