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वेंटिलेटर (लघुकथा)

“सुनिए , जरा प्याज काट दीजिये । ”

“देख नहीं रही हो , अभी-अभी थक हार के घर लौटा हूँ ।”

अरे….मैं भी तो आज 5 बजे दफ्तर से आयीं हूँ ।

“हाँ तो कौन सा पहाड़ खोद कर आई हो ।”

“तो तुम ही कौन सा लोहा पिघला रहे थे ?”

“इतना सुनते ही पति ने चप्पल उठा के पत्नी के मुहँ पर दे मारी, पत्नी तमतमा कर आई और पास ही पड़ा जूता उठा कर पति के मुहँ पर जड़ दिया ।”

इधर खबर आ रही थी.. “अभी –अभी , वेंटिलेटर पर पड़ी भारतीय संस्कृति ने दम तोड़ दिया ।”  

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित”  

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Comment by मिथिलेश वामनकर on January 29, 2015 at 12:54am

बेहतरीन लघुकथा ... आखिरी की पंच लाइन तो बस कमाल हो गया . आदरणीय हरिप्रकाश भाई जी इस सफल लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई निवेदित है. 

इस पोस्ट में फॉण्ट बहुत छोटे हो गए है कृपया एडिट कर साइज़ सही कर ले.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 28, 2015 at 9:49pm

इधर खबर आ रही थी.. “अभी –अभी , वेंटिलेटर पर पड़ी भारतीय संस्कृति ने दम तोड़ दिया ।”  

laghu katha me prastuti ka bada mahatv hai I aapkee is panch line ne katha ka  achchha sanskaar kiya hai I

Comment by Hari Prakash Dubey on January 28, 2015 at 8:52pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर , रचना पर आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया अपने आप में भारतीय समाज में आये परिवर्तन का बयान कर रही है और आपकी ये पंक्तियाँ ..... मूल्य गिरते हए देखें हैं, फिर गिरते हुए मूल्यों की बढ़ती हुई रफ़्तार देखी है. ..... बहुत ही सत्य हैं ! प्रोत्साहन हेतु आपका हार्दिक आभार ! सादर 

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 28, 2015 at 6:54pm

वाह सर ,,,,,,,,,,,, छोटी सी पर जीवन के कटु सत्य का चित्रण,,,,,,,,,,,,,,,,,

Comment by harikishan ojha on January 28, 2015 at 6:28pm

आदरणीय हरी प्रकाश जी,  बहुत ही जबरदस्त लिखा है आप ने, "गुरु मानना पड़ेगा, दम है लेखनी में", आप को  बहुत बहुत बधाईI

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 28, 2015 at 11:34am
जीवन के छे दशक जी चुका हूँ, उन्तालीस वर्ष सरकारी नौकरी की, मूल्य गिरते हए देखें हैं, फिर गिरते हुए मूल्यों की बढ़ती हुई रफ़्तार देखी है. अब आलम ये है कि कब क्या हो जाये , जो हो जाए वो थोड़ा , क्योंकि आने वाला क्या है , किसी को पता नहीं।
समाज समाज से चलता है, यदि समाज सही राह पर होगा तो राजनीति भी सही होगी, अर्थ - नीति भी सही और नियंत्रित होगी , क़ानून भी सयंत होगा। पर यदि समाज ही नियंत्रित नहीं होगा तो वह सब होगा जो हो रहा है, जो इस छोटी सी कथा में है, जो अभी कुछ दिन पूर्व श्री मिथिलेश वामनकर की ग़ज़ल -अजब बनाया हुआ फरिश्तो में चित्रित दिखाया गया है. सोचना पड़ता है, आने वाली पीढ़ियों को क्या क्या देखना होगा , कैसे - कैसे देखना होगा। प्रश्न उठता है , इस समाज से वास्तव में क्या किसी को कोई सरोकार है ? कौन है इस समाज का मार्ग- दर्शक ?
लिखते रहिये , आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, शायद लोगों को कुछ नज़र आये. सादर।

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