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ग़ज़ल-- मेरे हँसने हँसाने पे शक़ है उसे

212  212  212  212
मेरे हँसने हँसाने पे शक़ है उसे
बेव़जह मुस्कुराने पे शक़ है उसे
.................
अलव़िदा कह गया जाता-जाता मग़र
आज़तक भूलपाने पे शक़ है उसे
....................
हर किसी से करूँ ज़िक्र मैं यार का
पर व़फायें निभाने पे शक़ है उसे
...................
कब से तनहाई दुल्हन बनी है मेरी 
पर तुझे भूल जाने पे शक़ है उसे
.................
आँसुओं से समन्दर भी मैंने भरा
मेरे आँसू बहाने पे शक़ है उसे


उमेश कटारा 
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by शिज्जु "शकूर" on January 29, 2015 at 7:27pm
वाह आदरणीय उमेश जी क्या खूब मतला है दीगर अशआर भी अच्छे हैं बधाई आपको
Comment by gumnaam pithoragarhi on January 29, 2015 at 6:08pm

अच्छी ग़ज़ल कही है भाई जी बधाई

Comment by Hari Prakash Dubey on January 29, 2015 at 5:53pm

आदरणीय उमेश कटारा जी, बहुत बढ़िया हार्दिक बधाई , सादर !

Comment by vijay on January 29, 2015 at 2:29pm
वाह क्या बात है
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 29, 2015 at 12:34pm

कटारा जी

बेहतरीन गजल  i  अति सुन्दर i

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 29, 2015 at 11:32am
आँसुओं से समन्दर भी मैंने भरा
मेरे आँसू बहाने पे शक़ है उसे।
बहुत सुन्दर, बधाई, आदरणीय उमेश कटारा जी, सादर।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 29, 2015 at 11:32am

बेव़जह मुस्कुराने पे शक़ है उसे

बहुत खूब कहा आ० उमेश भाई , इस सुंदर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई l

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