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ग़ज़ल .........;;;गुमनाम पिथौरागढ़ी

2122 2122 212

जब हमें दिल का लगाना आ गया
राह में देखो ज़माना आ गया


ख़त तुम्हारा देखकर बोले सभी
खुशबू का झोंका सुहाना आ गया


इक पता लेके पता पूंछे चलो
बात करने का बहाना आ गया


नाम तेरा जपते जपते यूँ लगे
अब तुझे ही गुनगुनाना आ गया


ज़िन्दगी रफ़्तार में चलती रही
मौत बोली अब ठिकाना आ गया

बेरुखी ने ही दिखाया गई हमें
फूल पत्थर पर चढ़ाना आ गया


शख्स इक गुमनाम देखा बोले सब
शहर में देखो दिवाना आ गया


मौलिक व अप्रकाशित


गुमनाम पिथौरागढ़ी

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Comment

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Comment by gumnaam pithoragarhi on February 3, 2015 at 8:44pm

धन्यवाद खुर्शीद जी आपका शुक्रिया

Comment by khursheed khairadi on February 3, 2015 at 9:58am

ख़त तुम्हारा देखकर बोले सभी 
खुशबू का झोंका सुहाना आ गया

इक पता लेके पता पूंछे चलो 
बात करने का बहाना आ गया

नाम तेरा जपते जपते यूँ लगे 
अब तुझे ही गुनगुनाना आ गया

वाह.. आदरणीय गुमनाम साहब क्या ही उम्दा ग़ज़ल हुई है |शेर दर शेर दाद कबूल फरमावें |मक्ते में तखल्लुस गज़ब रंग भर रहा है |सादर अभिनन्दन |

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 1, 2015 at 6:40pm

धन्यवाद शिज्जु शकूर जी गिरिराज जी ........... सर समझ आ गया गलती से बिंदी इधर की उधर हो गयी ....... धन्यवाद


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 1, 2015 at 12:25pm

आदरणीय गुमनाम भाई , बढिया गज़ल के लिये बधाई स्वीकार करें । आ. शिज्जु भाई का इशारा समझियेगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 1, 2015 at 9:15am

वाह गुमनाम जी बेहतरीन ग़ज़ल है लाजवाब हर शे'र कमाल का है। दिली दाद पेश कर रहा हूँ इस रचना के लिये।
इक पता लेके पता पूछे चलो

गौर फरमाइयेगा

Comment by vijay on January 31, 2015 at 11:03pm
वाह गुमनाम जी क्या बात है
उम्दा
शेर दर शेर
Comment by gumnaam pithoragarhi on January 31, 2015 at 9:14pm
धन्यवाद शाम जी मुकेश जी गोपाल जी ....... हाँ लिखते समय शायद जल्दी कर गया ............ वो कुछ इस तरह है ..... बेरुखी ने ये सिखाया है हमें
फूल पत्थर पर चढ़ाना आ गया

आप सभी का धन्यवाद
Comment by Shyam Mathpal on January 31, 2015 at 3:11pm

Aadarniya Gumnami Ji

Har Pankti dil ko chu gai. Kya kamal ka likha hai.

Kaun Kahat a tum Gum Naam Ho.

Har Dil par tumara naam hai,Har jagah tumara paigaam hai.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 31, 2015 at 1:29pm


 बेरुखी ने ही दिखाया गई हमें----कुछ टंकण त्रुटि है मित्र , शायद i बाकी गजल बहुत सुन्दर i

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on January 31, 2015 at 10:32am

इक पता लेके पता पूंछे चलो
बात करने का बहाना आ गया bahut khooboorat rachna abadhaee

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