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सुना सहसा उसने

और दिल बैठ गया

तड़प रहे अंतस में  

नया डर पैठ गया

 

तकिये पर सिर छिपा

विवश वह लेट गया

आंसुओं की परतें अनगिन

दर्द में समेट गया

 

अगले रविवार फिर  

वही मंजर आयेगा

मौन-प्रेम सिसकेगा

तडपकर मर जाएगा

 

एक कन्या बेमन से अनचाहा वर वरेगी

प्यार के शव पर ही मांग वह भरेगी

अभी उसके व्याह का  आमंत्रण आया है

चंद्रमा विलुप्त हुआ, ग्रहण गहराया है

 

सुना सहसा उसने

और दिल बैठ गया

तड़प रहे अंतस में 

नया डर पैठ गया

 

कितने ग्रहण ऐसे भग्न-हृदय में विलसते

राहु कितने चन्द्र और सूर्य नित्य डसते ?

(मौलिक व् अप्रकाशित )

 

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 25, 2015 at 12:15pm

विजय सर i

आपका हार्दिक आभार i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 25, 2015 at 12:14pm

अनुज भंडारी जी

आपकी टीप से कृतकृत्य हुआ i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 25, 2015 at 12:14pm

आ० हरि प्रकाश जी

आपकी टीप से अनुगृहीत हुआ i  सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 25, 2015 at 12:12pm

आ० समर कबीर जी

आपका आभार i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 11:13am

बहुत-बहुत सुंदर. दिल को छू जाती रचना. उत्कृष्ट प्रस्तुति पर ह्रदय से बधाई आदरणीय डा.गोपाल जी

Comment by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 10:08am

सुना सहसा उसने

और दिल बैठ गया

तड़प रहे अंतस में 

नया डर पैठ गया

 

कितने ग्रहण ऐसे भग्न-हृदय में विलसते

राहु कितने चन्द्र और सूर्य नित्य डसते ?

आदरणीय गोपालनारायण सर ,ग़ज़ल और कविता एक ही नदी की दो धाराएँ हैं ,मुझे अपनी एक ग़ज़ल का शेर याद आ रहा है 

'कानों में इक सिसकी सीसा घोल गई \मुझको अब शहनाई से  डर लगता है' 

इतनी मार्मिक और मासूम कविता ,प्रेमी हृदय की पीड़ा का इतना जीवंत निर्वहन ,वह भी आध्यात्मिकता से परिपूर्ण श्रेष्ट कविता करने वाले संत कवि की कलम से ,नमन है सर |हार्दिक बधाई |सादर अभिनन्दन |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 25, 2015 at 1:22am

आदरणीय डॉ.गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर ,सुन्दर रचना हेतु हार्दिक बधाई निवेदित है.. सादर 

Comment by maharshi tripathi on February 24, 2015 at 11:16pm

बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति है,, आ. गोपाल नारायण जी ,,,,सुन्दर !!!

Comment by Pari M Shlok on February 24, 2015 at 11:36am
मार्मिक प्रस्तुति, बहुत बहुत बधाई आदरणीय डॉ O गोपाल नारायण जी,
Comment by Usha Choudhary Sawhney on February 24, 2015 at 10:35am

चंद्रमा विलुप्त हुआ, ग्रहण गहराया है

आदरणीय  गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी, अत्यंत मार्मिक, सिहरन पैदा कर गई आपकी रचना।  हार्दिक बधाई सर ।

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