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पल पल मुझ से रूठा है
हर पल यूँ तो झूठा है
सच और झूठ का ताना बाना
जीवन का रूप अनूठा है
इक पल में वो अपने दीखे
दो पल में कई सपने दीखे
कुछ पल में सब बिखर गये
यूँ साथ हमारा छूटा है
क्या पल पल मुझसे रूठा है
या जग सारा ये झूठा है !

मैं दीया हूँ तू बाती है
दुनिया क्यूँ तुझे जलाती है
मुझ पे भी कालिख आती है
प्यार के झोंके जब
आग बुझाने आते हैं
बेदर्द नहीं सह पाते हैं 
हाथ बढ़ा ढक लेते हैं
आग को और भड़काते हैं
क्या जग सारा ये झूठा है ?
या ... पल पल मुझसे रूठा है !!

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 18, 2015 at 5:40am

आदरणीय मोहन सेठीजी, आपके उत्साह और आपकी संलग्नता के प्रति सादर भाव हैं. रचना के लिए शुभकामनाएँ ..

सतत प्रयासरत रहें, आदरणीय.
शुभेच्छाएँ

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 17, 2015 at 4:38am

आदरणीय  Shyam Mathpal जी प्रोत्साहन के लिये धन्यवाद ...आभार 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 17, 2015 at 4:37am

आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी पसन्दगी के लिये आभार ...सादर 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 17, 2015 at 4:36am

आदरणीय  maharshi tripathi जी आभार ...सादर 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 17, 2015 at 4:35am

आदरणीय Hari Prakash Dubey जी बहुत बहुत धन्यवाद आपका ..सादर 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 17, 2015 at 4:34am

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आभार ...सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 16, 2015 at 7:53pm

आ० मोहन सेठी जी

सुन्दर प्रयास  . सादर .

Comment by Hari Prakash Dubey on March 16, 2015 at 7:28pm

आदरणीय मोहन सेठी जी, सुन्दर प्रस्तुति,

कुछ पल में सब बिखर गये

यूँ साथ हमारा छूटा है

क्या पल पल मुझसे रूठा है

या जग सारा ये झूठा है ! ,सुन्दर रचना ,बधाई प्रेषित ! सादर

Comment by maharshi tripathi on March 16, 2015 at 6:12pm

बहुत सुन्दर प्रस्तुति आ.Mohan Sethi 'इंतज़ार' जी |

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 16, 2015 at 11:35am
मैं दिया हूँ तू बाती है
दुनिया क्यूँ तुझे जलाती है
मुझ पे भी कालिख आती है
बहुत सुन्दर , आदरणीय मोहन सेठी जी , बधाई, सादर।

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