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नया बना भवन अपने रूप और बनावट पर मुग्ध हो रहा था | तभी अंदर से ईंट ने आवाज़ दी " क्यों इतने आत्ममुग्ध दिख रहे हो , रूपवान तो हम भी हैं "|
" हुँह , तुम्हारा रूप किसे दिखता है , सब तो मुझे ही देखते हैं ", भवन ने इतराते हुए कहा |
छड़ ने , कंक्रीट ने भी यही बात दुहरायी , भवन ने वैसे ही जवाब दिया |
ईंट बोली गर मैं हट जाऊं ? कंक्रीट बोला मैं पकड़ ढीली कर दूँ ? छड ने कहा मैं टेढ़ी हो लटक जाऊं?
भवन थोड़ा सोच में पड़ गया |
" तुम इसलिए खूबसूरत दिख रहे हो क्योंकि तुममे हमने अपनी खूबसूरती को आत्मसात कर दिया है ", यह सुनकर भवन को उसके अल्पज्ञान का भान हो गया |
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on March 24, 2015 at 4:35pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सुनील प्रसाद(शाहाबादी) जी.

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on March 24, 2015 at 4:17pm
बहुत खुबसूरत सोच को उभार दी है आपने आदरणीय ।
Comment by विनय कुमार on March 24, 2015 at 3:50pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया सविता मिश्रा जी..

Comment by विनय कुमार on March 24, 2015 at 3:50pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय विजय निकोर जी..

Comment by विनय कुमार on March 24, 2015 at 3:49pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी..

Comment by savitamishra on March 24, 2015 at 11:17am

बहुत ही सुन्दर लघुकथा

Comment by vijay nikore on March 24, 2015 at 10:59am

अच्छी लघुकथा के लिए बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 24, 2015 at 1:42am

आदरणीय विनय जी सफल लघुकथा की हार्दिक बधाई. लघुकथा के बिम्ब अपना काम बखूबी करते है और कथ्य के मूल भाव को पाठक तक पहुँचाने में सफल है. लघुकथा अपना पूरा प्रभाव छोडती है. पुनः बधाई 

इस लघुकथा को मैं कल ही पढ़ चूका था, कमेन्ट भी किया था. शायद मोबाईल से कमेन्ट सेंड नहीं हुआ. सादर 

Comment by विनय कुमार on March 24, 2015 at 1:30am

बहुत बहुत आभार आदरणीय कृष्ण मिश्रा जान गोरखपुरी जी..

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 23, 2015 at 11:48pm

बहुत ही सुन्दर लघुकथा! सार्थक सन्देश देती!बधाई आ० vinaya kumar singh  जी

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