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"ए रांड....." - परीक्षा देकर निकलते ही ऊँची आवाज में सीसा घोलती गाली वर्षा के कानों में पड़ी.. मुड़कर देखा तो संतोष सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुवे अपने मित्रों के साथ उसकी तरफ देख कर ठहाके लगा रहा था. वही जिसके प्यार को पिछले साल ठुकरा दिया था.. अपमान के एहसास से आँखों में आंसू आ गए .. पर वह चुपचाप वहां से चल दी.. क्या कहती ?

घर पहुँच कर देखा .. मुन्नी सो रही थी 

"वर्षा कल का पेपर कैसे देगी.. कोर्ट की तारीख आगे बढ़वा लेती" माँ रसोई से आते आते बोली 

"माँ कॉलेज की परीक्षा तो अगले साल फिर आएगी .. पहले उन दरिंदों को सजा दिलवाकर जिंदगी की एक परीक्षा तो पास करूँ" 

कहते हुवे मुन्नी को दूध पिलाने लगी ..थी तो  दरिंदों में से ही किसी एक का बेटी ... पर उसका क्या कसूर था.....बस प्यार से मुन्नी के बाल सहलाती रही 

मौलिक और अप्रकाशित 

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on April 14, 2015 at 3:27pm

लघुकथा कहने का सद्प्रयास हुआ है आ० निधि अग्रवाल जी। स्मरण रहे कि पंच अथवा चोट को लघुकथा की जान माना जाता है। इस पंच का अभाव है अभी आपकी लघुकथा में। इसको दोबारा पढ़ें और काट-छील कर शार्प करने का प्रयास करें।

Comment by Nidhi Agrawal on April 14, 2015 at 11:00am

आपका t बहुत धन्यवाद आदरणीय राजेश कुमारी जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 13, 2015 at 9:16pm

आज इसी हिम्मत  और आत्मविश्वास की जरूरत है हर लड़की को ..बहुत अच्छी लघु कथा लिखी निधि जी हार्दिक बधाई 

Comment by Nidhi Agrawal on April 13, 2015 at 11:49am

आदरणीय जीतेन्द्र जीकांता जीशिज्जू जी एवं जवाहर लाल जी.. रचना पर आपकी उपस्थिति और प्रेरणा दाई प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .. ये मेरी पहली लघुकथा की कोशिश थी .. शायद उतनी सही नहीं बनी इसलिए सभी गुणीजनों और गुरु मंच की नजर नहीं पढ़ी .. मुझे लगता है और कसाव की जरुरत है .. आशा है मेरी अगली रचना मंच को और पसंद आये ..

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 13, 2015 at 11:29am

सामयिक विषय पर अच्छी लघुकथा साझा की, आदरणीया निधि जी. बधाई

Comment by kanta roy on April 12, 2015 at 2:09pm
हिम्मत देती हुई एक मिशाल है यह रचना । लाख परेशानी आये लेकिन जुर्म के आगे कभी झुकना नही है ..टुटना नही है । एक सोच एक उम्मीद से भरी हुई बेमिसाल रचना के लिए बधाई स्वीकार करे आदरणीय निधि अग्रवाल जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 12, 2015 at 1:04pm

बेहतरीन संदेश देती रचना है हमें किसी भी हाल में हिम्मत नहींं छोड़ना चाहिये

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 10, 2015 at 7:49pm

"माँ कॉलेज की परीक्षा तो अगले साल फिर आएगी .. पहले उन दरिंदों को सजा दिलवाकर जिंदगी की एक परीक्षा तो पास करूँ" - यही है स्त्री की असली परीक्षा जिससे उसे हर हाल में निपटाना होता है    बेहतरीन अंदाज में प्रस्तुत लघुकथा अपनी मकसद में कामयाब रही है सादर 

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