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उसकी अपनी कोई संतान नहीं थी लोग उसे बाँझ कहते थे ! उसने (बाँझ) दरवाजे में कुण्डी लगाया ही था, की तभी किसी बच्चे की रोने की आवाज सुन वो वही ठिठक भर गयी ! दरवाजे की कुण्डी खोल हाथ में लालटेन लिए वो आवाज के दिशा में चल पड़ी ! थोड़ी दूर पहुंची ही थी की अचानक सामने का दृश्य देख चौक पड़ी, छोटे से कपडे में लिपटा वो बच्चा भूख से बुरी तरह बिलबिला रहा था ! उसने बच्चे को उठा कर सीने से लगा लिया,बच्चा ममतामयी स्पर्श पा शांत होकर सो गया ! सुबह लोगो ने उसके झोपडी से बच्चे की आवाज सुनी सुनकर सब चौक गए ! सच से परे लोगो ने बिना सोचे समझे उस पर तरह-तरह के आरोप लगाने शुरू कर दिए.! वो इन सबसे अनजान बेफिक्र बच्चे को सीने से चिपकाये रही ! मन ही मन उसने कुछ दृढ निस्चय सा कर लिया था ! अँधेरा होते ही वो हमेशा के लिए गॉव छोड़ चुकी थी ! अब वो नए गॉव में बस गयी है लोग अब उसे बाँझ नहीं 'माँ' कहते है..!
- जीतू
मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 14, 2015 at 11:11pm

इस संवेदनशील प्रस्तुति क्लिए हार्दिक बधाई, आ. जितेन्द्र भाई ..

सतत प्रयासरत रहें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 11, 2015 at 9:21am

आदरणीय जितेन्द्र जी बहुत मार्मिक कथा हुई है इस बेहतरीन प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 10, 2015 at 10:32am

मार्मिक कथा पर बधाई!

Comment by Jitendra Upadhyay on May 9, 2015 at 3:53pm

Aap sabhi ka sadar aabhar !

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 8, 2015 at 9:55pm

भावुक कथा को साझा करने हेतु आप बधाई के पात्र हैं. आ0 जीतू भाई जी, सादर

Comment by shashi bansal goyal on May 8, 2015 at 7:04pm
बहुत। सुन्दर कथा हुई है । बधाई आपको। आदरणीय जीतेन्द्र जी ।
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 8, 2015 at 6:15pm
सुन्दर प्रस्तुति , सादर।
Comment by मनोज अहसास on May 8, 2015 at 2:48pm
सार्थक और सकारात्मक सोच
सादर बधाई
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 8, 2015 at 2:00pm

अच्छा प्रयास है .  स्नेह.

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