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तुम चढ़ान हो जीवन की
मैं उतरान पे आ गया हूँ
चलो मिलकर समतल बना लें
हर अनुभूति
हर तत्व की
मिलकर औसत निकालें
कहीं तुम में उछाल होगा
कहीं मुझमें गहन बहाव होगा
चलो जीवन के चिंतन को
मिलकर माध्य सार बनालें
कभी तुम पर्वत शिखर पर हिम होगी
मैं ढलता सूरज होकर भी
तुम्हें जल जल कर जाऊँगा
चलो मिलकर जीवन को
अमृत धार बनालें
कभी तुम भैरवी सा राग होगी
मैं तुम्हारे सुर के पृष्ठाधार में ताल दूंगा 
चलो मिलकर जीवन काया को
समझौतों का एक मधुर गान बनालें ......

*******************************************************

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Saurabh Pandey on May 27, 2015 at 1:37am

सह-अस्तित्व और साहचर्य को क्या सुन्दर भावशब्द  मिले हैं ! हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय मोहनजी..

Comment by vijay nikore on May 20, 2015 at 4:00am

बहुत ही सुन्दर भाव। हार्दिक बधाई।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 19, 2015 at 3:08pm

आ०        

चढान  और उतार के बीच कामना के स्वर , मुबारक हो .

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 18, 2015 at 10:08am

बहुत ही सुंदर ,सर. शायद ऐसे ही जीवन की निरंतरता को बनाए रखा जा सकता है. बहुत-बहुत बधाई

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 18, 2015 at 8:20am

आदरणीय मनोज कुमार अहसास जी हार्दिक आभार ...सादर 

Comment by मनोज अहसास on May 17, 2015 at 4:40pm
नमस्कार सर
समझोतों के मधुर गान की बधाई
सादर

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