For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

                       

एक गज़ल,,,,
===========================
वज़्न = २१२२   २१२२  २१२२ २१२
फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलुन
===========================

सूख जातॆ फ़ूल पत्तॆ शाख़ भी हिलती नहीं !!
क्यूँ ग़रीबी कॆ बगीचॆ मॆं कली खिलती नहीं !!(१)

बॆटियॊं का बाप हूँ दिल जानता है सच सुनों,
आज कॆ इस दौर मॆं बॆटी सहज पलती नहीं !!(२)

बात करतॆ हॊ यहाँ अच्छॆ दिनॊं की खूब तुम,
तीरग़ी सॆ है भरी यॆ रात क्यूँ ढलती नहीं !!(३)

दॆख लॊ मुझकॊ तुम्हारॆ मुल्क का मज़दूर हूँ,
आज भी मुझकॊ ज़िया-ए-रॊशनी मिलती नहीं !!(४)

आसमां की छांव मॆं दिन ‘राज़’ कॆ बीतॆ भलॆ,
तल्ख़ियॊं की आग सॆ माँ की दुआ जलती नहीं !!(५)

"राज़ बुन्दॆली"
१५/०६/२०१५
मौलिक व अप्रकाशित

Views: 215

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 25, 2015 at 3:53am

बढ़िया ग़ज़ल 

हार्दिक बधाई आदरणीय राज बुंदेली जी

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 17, 2015 at 3:50pm

वाह ख़ूब 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 17, 2015 at 3:04pm

आसमां की छांव मॆं दिन ‘राज़’ कॆ बीतॆ भलॆ, 
तल्ख़ियॊं की आग सॆ माँ की दुआ जलती नहीं ..वाह वाह राज जी ..इस सुंदर ग़ज़ल के  इस बिशेष शेर के लिए ढेर सादी बधाई सादर 

Comment by Rahul Dangi Panchal on June 16, 2015 at 8:27pm
बहुत सुन्दर
Comment by narendrasinh chauhan on June 16, 2015 at 12:27pm

खूब सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 16, 2015 at 8:26am

बहुत खूब !! आदरणीय हार्दिक बधाई ।

Comment by jaan' gorakhpuri on June 16, 2015 at 8:25am

आ० "राज़ बुन्दॆली" सर,बहुत ही सुन्दर गजल हुयी है,हार्दिक बधाई! आ० समर सर ने  काफ़ियाबंदी पर जो बात कही है उससे मै सहमत हूँ!

Comment by वीनस केसरी on June 16, 2015 at 1:33am

वाह बहुत खूब

Comment by Samar kabeer on June 15, 2015 at 3:01pm
जनाब कवी "राज़" बुन्देली जी,आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही है आपने ,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
मतले और चौथे शैर में आपने क़ाफ़िये "हिलती","खिलती" और "मिलती" लिये हैं,बाक़ी के तीन अशआर में "जलती" "पलती" आदि. क़ाफ़िये लिये हैं,यह अमल ठीक नहीं है ,देख लीजियेगा ।

"दॆख लॊ मुझकॊ तुम्हारॆ मुल्क का मज़दूर हूँ,
आज भी मुझकॊ ज़िया-ए-रॊशनी मिलती नहीं"

इस शैर के सानी मिसरे में शब्द "ज़िया-ए-रोशनी" सही नहीं है क्यूँकि "ज़िया" का अर्थ भी रौशनी ही होता है,इस हिसाब से सानी मिसरा बदलना उचित होगा ,सुझाव के तौर पर एक मिसरा पेश करता हूँ :-

"आज भी मुझको यहाँ पर रौशनी मिलती नहीं"

देख लीजियेगा ।
Comment by Sushil Sarna on June 15, 2015 at 2:10pm

सूख जातॆ फ़ूल पत्तॆ शाख़ भी हिलती नहीं !!

क्यूँ ग़रीबी कॆ बगीचॆ मॆं कली खिलती नहीं !!(१)

बॆटियॊं का बाप हूँ दिल जानता है सच सुनों,

आज कॆ इस दौर मॆं बॆटी सहज पलती नहीं !!(२)

बहुत खूब आदरणीय बुंदेली जी … एक सच ,एक दर्द को समेटे इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सर जी।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi" posted a blog post

दो शब्द दृश्य (गणेश जी बाग़ी)

प्रथम दृश्य : शांति===========माँ ने लगाया चांटा...मैं सह गयी,पापा ने लगायाथप्पड़..मैं सह गयी,भाई ने…See More
1 hour ago
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post जीवन्तता
"आपका हार्दिक आभार, भाई समर कबीर जी।"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post जानता हूँ मैं (ग़ज़ल)
"आदरणीय समर कबीर साहब, सादर प्रणाम। मैं धन्य हो आपसे शाबाशी पाकर। बहुत शुक्रिया सर।"
yesterday
Samar kabeer commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post जानता हूँ मैं (ग़ज़ल)
"//काफ़िर नहीं शिकार किसी बद-दुआ का हूँ/      शह्र-ए-बुतां की धूल जो अब छानता हूँ…"
yesterday
Dr. Chandresh Kumar Chhatlani posted a blog post

मेरे ज़रूरी काम / अतुकांत कविता / चंद्रेश कुमार छतलानी

जिस रास्ते जाना नहींहर राही से उस रास्ते के बारे में पूछता जाता हूँ।मैं अपनी अहमियत ऐसे ही बढ़ाता…See More
yesterday
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post कान और कांव कांव(लघुकथा)
"आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय चंद्रेश जी।"
yesterday
Dr. Chandresh Kumar Chhatlani commented on Manan Kumar singh's blog post कान और कांव कांव(लघुकथा)
"गजब की रचना। बहुत-बहुत बधाई इस सृजन हेतु।"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post जानता हूँ मैं (ग़ज़ल)
"आदरणीय समर कबीर साहब, सादर प्रणाम। ग़ज़ल को अपने आशीर्वाद से नवाज़ने के लिए आपका बहुत आभारी हूँ। सर,…"
yesterday
Dr. Chandresh Kumar Chhatlani updated their profile
yesterday
Samar kabeer commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post जानता हूँ मैं (ग़ज़ल)
"जनाब रवि भसीन 'शाहिद' जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें…"
yesterday
Samar kabeer commented on मोहन बेगोवाल's blog post तरही ग़ज़ल
"जनाब मोहन बेगोवाल जी आदाब,ओबीओ के तरही मिसरे पर ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें…"
yesterday
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post धरणी भी आखिर रोती है
"हार्दिक धन्यवाद आपका"
yesterday

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service