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एक गज़ल,,,,
===========================
वज़्न = २१२२   २१२२  २१२२ २१२
फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलुन
===========================

सूख जातॆ फ़ूल पत्तॆ शाख़ भी हिलती नहीं !!
क्यूँ ग़रीबी कॆ बगीचॆ मॆं कली खिलती नहीं !!(१)

बॆटियॊं का बाप हूँ दिल जानता है सच सुनों,
आज कॆ इस दौर मॆं बॆटी सहज पलती नहीं !!(२)

बात करतॆ हॊ यहाँ अच्छॆ दिनॊं की खूब तुम,
तीरग़ी सॆ है भरी यॆ रात क्यूँ ढलती नहीं !!(३)

दॆख लॊ मुझकॊ तुम्हारॆ मुल्क का मज़दूर हूँ,
आज भी मुझकॊ ज़िया-ए-रॊशनी मिलती नहीं !!(४)

आसमां की छांव मॆं दिन ‘राज़’ कॆ बीतॆ भलॆ,
तल्ख़ियॊं की आग सॆ माँ की दुआ जलती नहीं !!(५)

"राज़ बुन्दॆली"
१५/०६/२०१५
मौलिक व अप्रकाशित

Views: 640

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 25, 2015 at 3:53am

बढ़िया ग़ज़ल 

हार्दिक बधाई आदरणीय राज बुंदेली जी

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 17, 2015 at 3:50pm

वाह ख़ूब 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 17, 2015 at 3:04pm

आसमां की छांव मॆं दिन ‘राज़’ कॆ बीतॆ भलॆ, 
तल्ख़ियॊं की आग सॆ माँ की दुआ जलती नहीं ..वाह वाह राज जी ..इस सुंदर ग़ज़ल के  इस बिशेष शेर के लिए ढेर सादी बधाई सादर 

Comment by Rahul Dangi Panchal on June 16, 2015 at 8:27pm
बहुत सुन्दर
Comment by narendrasinh chauhan on June 16, 2015 at 12:27pm

खूब सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 16, 2015 at 8:26am

बहुत खूब !! आदरणीय हार्दिक बधाई ।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 16, 2015 at 8:25am

आ० "राज़ बुन्दॆली" सर,बहुत ही सुन्दर गजल हुयी है,हार्दिक बधाई! आ० समर सर ने  काफ़ियाबंदी पर जो बात कही है उससे मै सहमत हूँ!

Comment by वीनस केसरी on June 16, 2015 at 1:33am

वाह बहुत खूब

Comment by Samar kabeer on June 15, 2015 at 3:01pm
जनाब कवी "राज़" बुन्देली जी,आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही है आपने ,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
मतले और चौथे शैर में आपने क़ाफ़िये "हिलती","खिलती" और "मिलती" लिये हैं,बाक़ी के तीन अशआर में "जलती" "पलती" आदि. क़ाफ़िये लिये हैं,यह अमल ठीक नहीं है ,देख लीजियेगा ।

"दॆख लॊ मुझकॊ तुम्हारॆ मुल्क का मज़दूर हूँ,
आज भी मुझकॊ ज़िया-ए-रॊशनी मिलती नहीं"

इस शैर के सानी मिसरे में शब्द "ज़िया-ए-रोशनी" सही नहीं है क्यूँकि "ज़िया" का अर्थ भी रौशनी ही होता है,इस हिसाब से सानी मिसरा बदलना उचित होगा ,सुझाव के तौर पर एक मिसरा पेश करता हूँ :-

"आज भी मुझको यहाँ पर रौशनी मिलती नहीं"

देख लीजियेगा ।
Comment by Sushil Sarna on June 15, 2015 at 2:10pm

सूख जातॆ फ़ूल पत्तॆ शाख़ भी हिलती नहीं !!

क्यूँ ग़रीबी कॆ बगीचॆ मॆं कली खिलती नहीं !!(१)

बॆटियॊं का बाप हूँ दिल जानता है सच सुनों,

आज कॆ इस दौर मॆं बॆटी सहज पलती नहीं !!(२)

बहुत खूब आदरणीय बुंदेली जी … एक सच ,एक दर्द को समेटे इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सर जी।

कृपया ध्यान दे...

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