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" आज कैसे याद किया , कोई काम था क्या ?
" नहीं यार , बस यूँ ही तुम्हारी याद आई और चला आया "|
कुछ देर बात चीत चलती रही और फिर वो उठ कर चल दिया | घर पहुँचते ही पत्नी ने पूछा " बात की उनसे , क्या कहा उन्होंने !
" हाँ , कहा तो हैं , देखो क्या होता हैं "|
" जब झूठ बोल नहीं सकते तो क्यों कोशिश करते हो | उनका फोन आया था , कह रहे थे जरूर कोई बात थी लेकिन मुझे बताया नहीं | अभी भी अपने उसूलों का पक्का हैं "|
" देखो तुम्हारे इतना कहने पर मैं चला तो गया था लेकिन कहते नहीं बना | खैर कहीं न कहीं मिल ही जाएगी उसको नौकरी "|
" हाँ , कुछ न कुछ तो कर ही लेगा बेटा , लेकिन तुम्हारे उसूलों की कीमत पर नहीं " और उसने उनका हाँथ अपने हांथों में कस कर थाम लिया | उनके चेहरे पर गहरे सुकून का भाव छा गया , उनके उसूल अभी भी अक्षुण्ण थे |
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 28, 2015 at 12:23pm

आ० विनय जी

इस कथा ने दिल से छुआ क्योंकि मैं  भी वसूल पसंद आदमी  हूँ . सादर,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 28, 2015 at 4:43am

बहुत उत्कृष्ट लघुकथा 

कथा की गहनता ने गहरे तक छुआ 

बधाई आपको इस सफल लघुकथा की प्रस्तुति  पर 

Comment by विनय कुमार on June 26, 2015 at 9:18pm

 बहुत बहुत आभार आदरणीय कृष्ण मिश्रा जान गोरखपुरी जी.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 26, 2015 at 8:50pm

बहुत बेहतरीन! बधाई विनयसरजी!

Comment by विनय कुमार on June 26, 2015 at 1:55pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी.

Comment by विनय कुमार on June 26, 2015 at 1:55pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया राजेश कुमारी जी , आप ने सराहा | आप का कहना बिलकुल सही है , इस परिवर्तन के बाद लघुकथा का सम्प्रेषण बेहतर हो जायेगा .

Comment by Shyam Narain Verma on June 26, 2015 at 1:27pm

सुंदर लघु कथा के लिए बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 26, 2015 at 11:48am

बहुत सुन्दर विषय पर लिखी गई है लघु कथा इसमें निहित सन्देश भी स्पष्ट है जो उसूलों के पक्के होते हैं वो किसी से दया की भीख नहीं मान सकते चाहे वो अपनी औलाद के लिए ही क्यूँ न हो |उनका स्वाभिमान सामने आके खड़ा हो जाता है .मर्म बहुत ख़ास है बहुत बहुत बधाई आपको विनय कुमार जी |इसके अंत को इस तरह लिखें तो सम्प्रेषण बेहतर होगा -----

खैर कहीं न कहीं मिल ही जाएगी बेटे को  नौकरी "|
" हाँ , किन्तु  तुम्हारे उसूलों की कीमत पर नहीं "  उसके हाथों को  अपने हाथों में लेते हुए  पत्नी ने कहा | उसके  चेहरे पर गहरे सुकून का भाव छा गया  ये सोचकर कि उसके  उसूल अभी भी अक्षुण्ण थे | 

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