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राय बहादुर : लघु कथा

“मेरे ग्रैंड फादर राय बहादुर थे” ..... उस व्यक्ति ने बुद्धिजीवियों की सभा में अकड़ के साथ यह बात कही ।   सभा के आयोजक ने भी गर्व से अपना सर ऊंचा कर लिया । वहाँ  उपस्थित लोग जो उस व्यक्ति को मिल रहे विशेष सम्मान, तवज्जो , उसके समृद्ध पहनावे एवं उसकी मंहगी गाड़ी से पहले ही नतमस्तक हो रहे थे, यह सुनकर थोड़े  और विनीत भाव दिखलाने लगे। उसे मंच पर सबसे ऊंची कुर्सी दी गयी । सब उसके साथ एक फोटो खिचवा लेना चाहते थे । महेश सभा में सबसे पीछे की कुर्सी पर उपेक्षित सा बैठा अपने मलिन कपड़ों को देख रहा था।  वह ज़ोर से चिल्ला चिल्ला कर कहना चाह रहा था  कि उसके दादा जी एक स्वतन्त्रता सेनानी थे , जिनकी सारी संपत्ति अंग्रेज़ो ने जब्त कर ली थी .... पर वह चुप रहा ....  

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Comment by rajesh kumari on July 2, 2015 at 12:50pm

जिसका रुतबा उसकी ही पूछ ये हकीक़त है इस देश की जो शुरू से कायम रही है और रहेगी मँहगी कार मंहंगा पहनावा देखते ही लोग उसे ऊँची कुर्सी  पर बिठाने लगते हैं मानव  के मनोविज्ञान को बखूबी लघु कथा में चित्रित किया है आपने नीरज जी बहुत- बहुत बधाई. 

Comment by Rahul Dangi Panchal on July 1, 2015 at 8:36pm
बहुत अच्छी कथा
Comment by Neeraj Neer on July 1, 2015 at 5:03pm

आदरणीय मिथिलेश जी आपके इस प्रोत्साहन एवं सराहना हेतू हार्दिक धन्यवाद ....

Comment by Neeraj Neer on July 1, 2015 at 5:02pm

आपका हार्दिक आभार आदरणीय विनय जी ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 1, 2015 at 2:29pm

आदरणीय नीरज जी, आजादी के इतने सालों बाद भी ये विडम्बना मौजूद है जिसे आपने कसावटी कथानक में लघुकथा के रूप में प्रस्तुत किया है. आपने एक बेहतरीन प्रसंग उठाया है और बड़े ही सधे हुए ढंग से प्रसंग को शाब्दिक किया है. इस गहन प्रस्तुति के लिए बधाई और साधुवाद 

Comment by विनय कुमार on June 29, 2015 at 10:34pm

आपकी पहली लघुकथा पढ़ी मैंने , बढ़िया लिखा है आपने । धन का ही सम्मान है आज , चाहे जैसे कमाया हो , बधाई इस रचना के लिए.

Comment by Neeraj Neer on June 29, 2015 at 8:38pm

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव साहब ..... अगर आज यह गौरव की बात होती तो कोई यह न कहता कि मेरे ग्रैंड फादर "राय बहादुर" थे ........................क्योंकि राय बहादुर कोई बहादुरी के काम का इनाम तो था नहीं ..... अंग्रेजों से वफा एवं देश से गद्दारी करने वालों को ही ऐसी उपाधियाँ मिलती थी .... और फिर  महेश को सबसे पीछे की सीट पर क्यों बैठना पड़ा, सब लोग उस अमीर व्यक्ति के साथ फोटो क्यों खिचवाना चाहते थे ................... महेश इसीलिए शायद चुप रहा कि जिस देश में पढे लिखे बुद्धिजीवि भी धन की चकाचौंध में इतिहास भुला बैठते हैं वहाँ उसके बोलने चिल्लाने का क्या असर होता .... 

Comment by Neeraj Neer on June 29, 2015 at 8:21pm

आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी आपका हार्दिक आभार 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 29, 2015 at 8:19pm

एक प्रश्न यह उठता है कि वह चुप क्यों रहा . आजाद भारत में तो यह गौरव की बात थी . सादर .

Comment by Shyam Narain Verma on June 29, 2015 at 11:41am
सुन्दर लघु कथा के लिये बधाई ।

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