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चढ़ावा - लघुकथा.....

चढ़ावा - लघुकथा

''दादू .... !''
''हूँ .... !''
''हम मंदिर में पैसे क्यों चढ़ाते हैं … ?''
''बेटे , हर आदमी को अपनी नेक कमाई से कुछ न कुछ अपनी श्रद्धानुसार प्रभु के चरणों में अर्पण करना चाहिए। ''
''लेकिन दादू , आप तो कहते हैं कि हमारे पास जो भी है तो प्रभु का दिया है … . । ''
''हाँ तो … । ''
''तो जब सब कुछ प्रभु ही देते हैं तो हम फिर उन्हें पैसे क्यों चढ़ाते हैं ?''
दादू निरुत्तर हो पोते का मुख देखने लगे।

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 626

Comment

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Comment by Sushil Sarna on August 9, 2015 at 9:15pm

आदरणीय  pratibha pande  जी लघु कथा पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on August 9, 2015 at 9:14pm

आदरणीय  JAWAHAR LAL SINGH जी लघु कथा पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार। 

Comment by pratibha pande on August 9, 2015 at 8:00pm
बहुत सही बात कह दी आपने रचना के माध्यम से , बधाई आपको इस सशक्त रचना के लिए आ० सुशील सरना जी
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 9, 2015 at 12:15pm

सुन्दर! बड़े रोचक ढंग से आपने प्रहार किया है सादर!

Comment by Sushil Sarna on August 6, 2015 at 12:48pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी मेरे प्रयास आपके आत्मीय अनुमोदन ने जो मान दिया है उसके लिए तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Sushil Sarna on August 6, 2015 at 12:45pm

आदरणीय  Sulabh Agnihotri  जी लघु कथा पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on August 6, 2015 at 12:45pm

आदरणीय  Dr. Vijai Shanker जी लघु कथा पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on August 6, 2015 at 12:43pm

आदरणीया कांता रॉय जी मेरे प्रयास को इतना मान देने का तहे दिल से शुक्रिया। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 6, 2015 at 12:15pm

आदरणीय सुशील सरना सर, जोर का झटका धीरे से वाली इस शानदार और सफल लघुकथा पर हार्दिक बधाई. पोते के यक्ष प्रश्न पर अच्छे अच्छे आज तक निरुत्तर है. सादर 

Comment by Sulabh Agnihotri on August 6, 2015 at 11:15am

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