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जहॉं था अंधेरा घना जि़दगी का
वहीं से मिला रास्ता रोशनी का
सलीबें न बदली न बदले मसीहा
वही हाल है आज तक हर सदी का
सितारे फलक से न आये उतर कर
हुआ कब ख़सारा किसी आशिकी का
न तुम रो सके औ हमारी अना को
सहारा मिला आरज़ी ही खुशी का
समन्दर सुख़न के तलाशे बहुत से
ख़जा़ना मिला है तभी शाइरी का
पिया है वही जाम जो दे ख़ुदाई
न अहसां उठाया न बदला सलीका
यही चार दिन है यहीं जी सको तो
न अफसोस होगा कभी जि़ंदगी का
मौलिक एवं अप्रकाश्ाित
Comment
आदरणीय रवि भाई खूब सूरत मतला से शुरू हुआ सफर अंत तक बहुत बढिया रहा । ग़ज़ल के लिये आपको दिली बधाइयाँ ।
यही चार दिन है यहीं जी सको तो ----- इसे अगर यूँ कहें तो ? यही चार दिन भी अगर जी लिये तो
न अफसोस होगा कभी जि़ंदगी का न अफसोस होगा कभी जि़ंदगी का
सोच के देखियेगा आदरणीय ।
आदरणीय रवि जी, शानदार ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद हाज़िर है-
जहॉं था अंधेरा घना जि़दगी का
वहीं से मिला रास्ता रोशनी का........... बेहतरीन मतला
सलीबें न बदली न बदले मसीहा
वही हाल है आज तक हर सदी का.... वाह वाह
सितारे फलक से न आये उतर कर
हुआ ना ख़सारा किसी आशिकी का ..... बहुत बढ़िया ....हुआ कब ख़सारा किसी आशिकी का
न तुम रो सके औ हमारी अना को
सहारा मिला आरज़ी ही खुशी का..... वाह वाह बढ़िया
समन्दर सुख़न के तलाशे बहुत से
ख़जा़ना मिला है तभी शाइरी का............... शानदार शेर .... हासिल-ए-ग़ज़ल
पिया है वही जाम जो दे ख़ुदाई
न अहसां उठाया न बदला सलीका............. बहुत खूब
यही चार दिन है यहीं जी सको तो
न अफसोस होगा कभी जि़ंदगी का............. बहुत सुन्दर
इस शानदार ग़ज़ल पर दिल से दाद कुबूल फरमाएं
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