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तुम्हारे शहर में खाना ख़राब हूँ मैं तो (फिल बदीह ग़ज़ल 'राज')

1212   1122    1212    22

तमाम उम्र जलूँ आफ़ताब हूँ मैं तो,

पढ़ी न जाय कभी वो किताब हूँ मैं तो

 

न ढूँढिये मुझे केवल सराब हूँ मैं तो,

किसी चमन का फ़सुर्दा गुलाब हूँ मैं तो      .

 

खुदी के प्रश्न का खुद ही जबाब हूँ मैं तो,

हुजूर अपनी जमीं का नबाब हूँ मैं तो

 

एजाज नूर का जिसके जुबाँ जुबाँ पर है,

उस आईने का फ़क़त इक निकाब हूँ मैं तो

 

दिखा सके न कभी आँख गैर कोई भी

,वतन की हद पे लिखा इक रुआब हूँ मैं तो

 

बुला के बज्म में अपनी भला क्या कीजैगा

,तुम्हारे शहर में खाना ख़राब हूँ मैं तो

 

मुझे बुला के भला ख़्वाब में क्या पाओगे

मुसीबतों का सबब बेहिसाब हूँ  मैं तो

 

करेगा कैसे उजाला ये डूबता सूरज,

रखो न आस मेरी इक हुबाब हूँ मैं तो

---------------मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

 

 

 

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 17, 2015 at 8:50pm

शिज्जू भैया ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरे लिए ये आश्वस्ति का कारण हुई  आपने दुसरे शेर के विषय में कहा जिसमे मैंने सराब शब्द का प्रयोग छलावे के अर्थ में लिया है 

आपका तहे दिल से आभार .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 17, 2015 at 8:48pm

मनोज कुमार जी,आपने इस ग़ज़ल को इतना मान दिया अभिभूत हूँ मेरा लिखना सार्थक हो गया तहे दिल से आभारी हूँ दिल से शुभकामनाये  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 17, 2015 at 8:38pm
आदरणीया राजेश दीदी फ़िल बदीह ग़ज़ल ज़बरदस्त है । दूसरे शे'र में जो भाव है उस लिहाज से ये और अच्छा शे'र बन सकता है
Comment by मनोज अहसास on September 17, 2015 at 8:19pm
बेमिसाल ग़ज़ल आदरणीया राजेश कुमारी जी
इतनी बढ़िया ग़ज़ल हुई है क्या कहा जाये
आपका लिखा पढ़कर हमारे जैसे नए लोग सीख रहें है
सादर नमन एवम् बधाई

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 17, 2015 at 8:12pm

आ० डॉ० गोपाल भाई जी,आपका तहे दिल से आभार |  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 17, 2015 at 8:11pm

मिथिलेश भैया ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ आपकी नवाजिश का दिल से शुक्रिया .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 17, 2015 at 7:54pm

अ० दीदी

बेहतरीन गजल  आपको बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 17, 2015 at 5:23pm

आदरणीया राजेश दीदी बढ़िया फ़िल-बदीह ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं 

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