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आत्मिक प्रेमतत्व

आत्मिक प्रेमतत्व …

जलतरंग से
मन के गहन भावों को
अभिव्यक्त करना
कितना कठिन है

हम किसको प्रेम करते हैं ?
उसको !
जिसके संग हमने
पवन अग्नि कुण्ड के चोरों ओर
सात फेरे लिए
या उसको
जिसके प्रेम में
स्वयं को आत्मसात कर हम
जीवन के समस्त क्षण
उसके नाम कर दिए
एक प्रेम
जीवन के अंत को जीवन देता है
और दूसरा अंतहीन जीवन को अंत देता है
जिस प्रेम को बार बार
शाब्दिक अभिव्यक्ति की आसक्ति हो
उसका अमरत्व मरीचिका समान है
और जिस प्रेम की अभिव्यक्ति
मौनता के आवरण में निशब्द अभिव्यक्त हो
वही आत्मिक प्रेमतत्व की पहचान है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 494

Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 29, 2015 at 1:25pm

आदरणीया प्रतिभा जी आपके स्नेहवचनों का हार्दिक आभार। 

Comment by pratibha pande on September 28, 2015 at 7:22pm

जिस प्रेम को बार बार 
शाब्दिक अभिव्यक्ति की आसक्ति हो

उसका अमरत्व मरीचिका समान है 

गूढ़ भाव लिए सुंदर रचना , हार्दिक बधाई आपको आदरणीय 

Comment by Sushil Sarna on September 28, 2015 at 1:48pm

आदरणीयडॉ गोपाल नरायन श्रीवास्तव जी रचना पर आत्मीय प्रशंसात्मक अभिव्यक्ति का दिल से शुक्रिया। 

Comment by Sushil Sarna on September 28, 2015 at 1:46pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी रचना पर आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on September 28, 2015 at 1:44pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी रचना की समीक्षात्मक प्रतिक्रिया  प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार। सर ''पवन अग्नि कुण्ड के चोरों ओर '' पंक्ति में ''चारों'' के स्थान पर ''चोरों'' टंकित हो गया जो टंकण त्रुटि है कृपया इसे'' चारों '' ही पढ़ें। इसके अतिरिक्त कोई अक्षरी त्रुटि हो तो कृपया  का कष्ट करें ताकि तदनुसार संशोधन किया जा सके। धन्यवाद। 

Comment by Sushil Sarna on September 28, 2015 at 1:38pm

आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी आपके स्नेह का हार्दिक आभार। 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 28, 2015 at 10:53am

सुन्दरते  तेरी जय  !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 28, 2015 at 10:50am

सत्य कथन !  आदरणीय बहुत सुन्दर वैचारिक कविता हुई है । आपको हार्दिक बधाइयाँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 27, 2015 at 10:43pm

आदरणीय सुशील सरना सर, अक्षरी संबधी त्रुटियाँ एक सशक्त रचना को भी प्रभावहीन बना देते है. सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on September 26, 2015 at 12:03pm
अच्छी प्रस्तुति आदरणीय ,बधाई 

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