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हरसिंगार फूला नहीं समाया

शुभ्र चाँदनी ने था दुलराया
हरसिंगार फूला नहीं समाया

*****

तिर गया मदहोश हो
चमन की सुंदर हथेली पर
छुप कर खेलता आँखमिचौली
जान देता निशा की सहेली पर
सुंदरी ने जूड़े में सजाया
हरसिंगार फूला नहीं समाया
*****

खिल गया कपोलों पे
रजत कणों की कर्पूरी आभा लिए
वसुधा को करने सुगंधित
रूप अपना सादा लिए
भोर ने वृक्ष को धीरे से हिलाया
हरसिंगार फूला नहीं समाया
*****

बिछ गया बेसुध हो
मन में असीमित नेह लिए
हर घर को लगा महकाने
अपनी समर्पित देह लिए
किसी ने सतिए पर सजाया
हरसिंगार फूला नहीं समाया। 

मौलिक व अप्रकाशित 

कल्पना मिश्रा बाजपेई 

Views: 597

Comment

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Comment by kalpna mishra bajpai on October 2, 2015 at 8:59pm

आभार आदरणीय pratibha pande जी आपका 

Comment by pratibha pande on October 2, 2015 at 2:54pm

  भाव विभोर कर देने वाली रचना हरसिंगार की ताजगी लिए बधाई आपको आदरणीया कल्पना जी 

Comment by kalpna mishra bajpai on October 1, 2015 at 7:11pm

आभार आदरणीय सुशील जी आप का 

Comment by Sushil Sarna on October 1, 2015 at 4:56pm

बिछ गया बेसुध हो
मन में असीमित नेह लिए
हर घर को लगा महकाने
अपनी समर्पित देह लिए
किसी ने सतिए पर सजाया
हरसिंगार फूला नहीं समाया।
… वाह आदरणीया हरसिंगार को केंद्र में रख आपने रचना में महक्तॆ भावों का सजीव चित्रण किया है, हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by kalpna mishra bajpai on September 30, 2015 at 7:46pm

आभार आपका आदरणीय Shyam Narain Verma जी 

Comment by Shyam Narain Verma on September 30, 2015 at 10:50am

सुन्दर भाव पूर्ण रचना के लिये आपको बधाइयाँ ।

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