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"तीन प्रत्युत्तर"-- [प्रत्युत्तर संदर्भित लघु कथा]

"तीन प्रत्युत्तर" [ प्रत्युत्तर संदर्भित लघु कथा]

पति देव जी की ज़िद पर आज पैदल ही दोनों एक समारोह में शामिल होने घर से निकले थे।
बाज़ार में एक सड़क पर एक सात-आठ साल का बच्चा स्कूल बैग लिए बुरी तरह रो रहा था। ट्यूशन से लौटते समय शौच पर नियंत्रण न कर पाने से उसका पैन्ट और पैर पतले 'मल' से सने हुये थे।

पत्नी के विरोध के बावजूद सक्सेना जी ने उस अनजान बच्चे को पास की ही एक प्याऊ तक ले जाकर उसकी सफाई करने में सहायता की। बच्चे का चेहरा खिल उठा। वह सामान्य हो कर घर की ओर चल पड़ा।

कुछ अपमानित सा महसूस कर रही पत्नी नाराज़ होकर बोल पड़ी-" अगर यही सब करना है तो मुझे साथ में कभी मत लाया करो। किसी खुशी के समारोह में शामिल होना तुम्हें आता ही नहीं है। पता नहीं ज़िन्दगी जीना कब सीखोगे !"

-"स्त्री होते हुए तुमने खुशी के एक अनमोल पल को खो दिया और मैंने........मैंने उस पल को जी लिया।"- राहत की एक लम्बी साँस लेकर सक्सेना जी ने उत्तर दिया ।


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 7, 2017 at 10:15pm
मेरी इस ब्लोग-पोस्ट पर समय देकर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय राजेश कुमारी जी व आदरणीय गिरिराज भंडारी साहब।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 3, 2015 at 1:05pm

बहुत खूब , आदरणीय , सच है महिला इतही असंवेदन शील कैसे ? बधाई आपको ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 3, 2015 at 10:14am

एक स्त्री होकर भी बच्चे की परेशानी नहीं समझ सकी हैरत होती है जब कि घर में अपने बच्चे का वो सब करती है ...किन्तु परिस्थितियां कैसे बदल रही हैं  ...आजकल तो घर में भी पतियों को बच्चों के सब काम करते देखते हैं ....अपने बच्चे का सब कर लेते हैं किन्तु बाहर दूसरे के बच्चे की इसमें मदद करना इंसान के चरित्र को बहुत ऊँचाई पर ले जाता है आपकी लघु कथा प्रेरणास्पद है जिसके लिए आप बधाई के पात्र हैं |

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 1, 2015 at 6:00pm
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय Sushil Sarna जी रचना के अवलोकन व सराहना के लिए।
Comment by Sushil Sarna on October 1, 2015 at 4:50pm

आत्मिक भावों का सजीव चित्रण करती इस लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 1, 2015 at 12:46pm
तहे दिल बहुत बहुत धन्यवाद मेरी कथा का अवलोकन करने व प्रोत्साहन देने के लिए आदरणीय Tej Veer Singh जी, आदरणीया Neeta Saini जी, आदरणीया Savitamishra जी , आदरणीयShiv Narain Verma जी।
Comment by TEJ VEER SINGH on October 1, 2015 at 11:44am

हार्दिक बधाई अदरणीय शेख उस्मानी जी!बहुत मार्मिक और दिल को छूने वाली लघुकथा!अकसर परिवारों में पति पत्नी के बीच इस तरह की जुमले बाज़ी होती रहती  है उसकी मुख्य वज़ह शायद उनकी पारवारिक पृष्ठ भूमि होती होगी!यह मेरी अपनी सोच है!

Comment by Neeta Saini on September 30, 2015 at 8:06pm
सुन्दर लघुकथा के लिए आपको बधाई आदरणीय
Comment by savitamishra on September 30, 2015 at 6:32pm

बढ़िया बन पड़ी हैं कथा | मदद से जो सुकून मिलता हैं वह सच में खो दिया पत्नी ने | जिन्दगी तो सक्सेना साहब ही जिए |

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 30, 2015 at 6:15pm
तहे दिल बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय Shyam Narain Verma जी।

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