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ग़ज़ल : कहाँ अपना भला मैं

कहाँ अपना भला मैं कर रहा हूँ
ख़ुशी अपनों की हर दम देखता हूँ

इसे जीना कहें तो आप कह लें
गुज़ारे के लिए लड़ता रहा हूँ

ख़यालोँ में बड़ी रानाइयां है
तुम्हें मैं इसलिए भी सोचता हूँ

इरादा आशिकी का था कभी पर
जुनूँ का एक अब मैं सिलसिला हूँ

गुनाहों पर मुझे तस्लीम कब थी
इसी मसले पे मैं सबसे ख़फा हूँ

बनाया है तबीअत से ख़ुदा ने
उसी की मैं इनायत का पता हूँ

मुकम्मल वो ग़ज़ल है इक सुरीली
मैं मुबहम शेर सा तनहा खड़ा हूँ

गुज़र जाते सभी रुकते नहीं हैं
अकेला रास्ते सा रह गया हूँ

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Abid ali mansoori on November 6, 2015 at 11:25pm

इसे जीना कहें तो आप कह लें
गुज़ारे के लिए लड़ता रहा हूँ

ख़यालोँ में बड़ी रानाइयां है
तुम्हें मैं इसलिए भी सोचता हूँ

सच में बहुत ही उम्दा आदरणीय रवि शुक्ला जी, हार्दिक वधाई आपको!

Comment by मोहन बेगोवाल on November 6, 2015 at 7:35pm

आदरणीय रवि जी, ग़ज़ल के सभी अश'आर बहुत ही कमाल हुए , ये शे'र मुझे बहुत प्यारा लगा 

इसे जीना कहें तो आप कह लें
गुज़ारे के लिए लड़ता रहा हूँ - बधाई हो 

Comment by मनोज अहसास on November 6, 2015 at 1:55pm
बहुत बहुत बधाई
सादर
Comment by Sushil Sarna on November 6, 2015 at 1:38pm

गुज़र जाते सभी रुकते नहीं हैं
अकेला रास्ते सा रह गया हूँ
वाह आदरणीय रवि जी बहुत ही दिलकश अशआर बने हैं … ग़ालिब होते तो जरूर कहते कि हर शे'र पे दम निकलता है .... बहरहाल इस खूबसूरत अहसासों वाली ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई स्वीकार करें आदरणीय। सादर _/\_

Comment by Ravi Shukla on November 6, 2015 at 1:29pm

आदरणीय मिथिलेश जी बहुत बहुत आभार आपका । आपको ग़ज़ल पसंद आई और शेर के कई नये अर्थ भी और समझ आये आपकी पसंद को सलाम । अनुग्रह बनाये रखें । सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 6, 2015 at 1:19pm

आदरणीय रवि जी बहुत शानदार ग़ज़ल हुई है.  शेर दर शेर दाद हाज़िर है-

कहाँ अपना भला मैं कर रहा हूँ
ख़ुशी अपनों की हर दम देखता हूँ............. आप कितने सहज अंदाज में अपनी बात कह जाते है. कमाल का मतला हुआ है. मैंने इस मतले को कई दफ़ा पढ़ा और हर बार इसकी गहराई तक पहुँचता गया हूँ.  एक पिता, एक पति एक सरपरस्त होने का मतलब क्या है, बखूबी उजागर हुआ है. शानदार मतला हुआ है. दाद कुबूल फरमाएं 

इसे जीना कहें तो आप कह लें
गुज़ारे के लिए लड़ता रहा हूँ........... लाजवाब .... कमाल .... दिल जीतू शेर....आपने दिल बात कह दी. हासिल-ए-ग़ज़ल 

ख़यालोँ में बड़ी रानाइयां है
तुम्हें मैं इसलिए भी सोचता हूँ.......... बहुत बढ़िया शेर हुआ है.

इरादा आशिकी का था कभी पर
जुनूँ का एक अब मैं सिलसिला हूँ......दिल खुश कर दिया आपने ये शेर कह के. अपना सच आपके लफ़्ज़ों में महसूस कर रहा हूँ

गुनाहों पर मुझे तस्लीम कब थी
इसी मसले पे मैं सबसे ख़फा हूँ............... कमाल का अंदाज़े-बयां .... 

बनाया है तबीअत से ख़ुदा ने
उसी की मैं इनायत का पता हूँ............. बढ़िया शेर 

मुकम्मल वो ग़ज़ल है इक सुरीली
मैं मुबहम शेर सा तनहा खड़ा हूँ............. वाह वाह वाह.. क्या खूब कहा है!

गुज़र जाते सभी रुकते नहीं हैं
अकेला रास्ते सा रह गया हूँ....................... ग़ज़ल अपने चरम पर है. आदरणीय रवि जी आपकी ग़ज़ल की सादगी और गहराई वो भी छोटी बह्र में. कमाल है. लाजवाब ग़ज़ल हुई है. इस ग़ज़ल पर आपको दिल से दाद और मुबारकबाद .... सादर 

Comment by Ravi Shukla on November 6, 2015 at 1:09pm

पोस्‍ट में ग़ज़ल से पूर्व इसका वज्न गलती से लिखने से रह गया था कृपया इसके साथ पढने का निवेदन है

1222 1222 122

Comment by Ravi Shukla on November 6, 2015 at 12:20pm

आदरणीय गिरिराज जी आपकी सराहना से हौसला मिलता है बहुत बहुत आभार आपका । आपके करीब हो सका है  कोई शेर यह हमारे शेर का सौभाग्‍य है । आपके मार्ग दर्शन के लिये भी आभार । सादर

Comment by Ravi Shukla on November 6, 2015 at 12:18pm

आदरणीय श्‍याम नारायण जी गजल पर शिरकत के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया  ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 6, 2015 at 10:44am

आदरनीय रवि भाई , बेहतरीन गज़ल हुई है , आपको इस गज़ल के लिये हार्दिक बधाइयाँ ॥

इसे जीना कहें तो आप कह लें
गुज़ारे के लिए लड़ता रहा हूँ

बनाया है तबीअत से ख़ुदा ने
उसी की मैं इनायत का पता हूँ

मुकम्मल वो ग़ज़ल है इक सुरीली
मैं मुबहम शेर सा तनहा खड़ा हूँ   --  ये अशआर मुझे मेरे दिल के क़रीब लगे , पुनः बधाइयाँ ॥

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